प्रदूषण कम कर रहा सांसें, हो जाए होशियार, विश्व पर्यावरण दिवस- धरती को बचाने में करें सहयोग

पर्यावरण दिवस आ गया,बृक्ष लगाने का स्कल्प दिलाते कार्यक्रम,पर्यावरण संरक्षण सन्देश रैली,वातानुकूलित कक्षो में चिंतन सभा,रंगोली,चित्रकला प्रतियोगिताएं,तमाम तामझाम के बीच मे हमे इस बात का अहसास होगा कि हम चैतन्य समाज के चिंतनशील व्यक्ति है और हमने इस दिन अपने जागरूक होने और जागरूक करने के कर्तव्य का निर्वहन किया है,पर्यावरण दिवस मनाया है,लेकिन बात मुद्दे की है कि वन क्षेत्र का आंकलन करे तो पिछले पांच वर्षों में भारत ने 367 वर्ग किमी वन क्षेत्र खो दिया है।विश्व मंच पर किये जा रहे प्रयास, विकाशशील देशों पर थोपे गए पर्यावरण संरक्षण श्वेत पत्र के अलावा और कुछ नही,।विकसित राष्ट्र की हवाओ में घुलता जहर और बढ़ता तापमानआज के दिवस की उपादेयता की वास्तविक तस्वीर प्रतिबिम्बित करता है।सवाल यह है कि क्या हम इतने सालों में आमजन में पर्यावरण संरक्षण मतलब पौधे लगाओ ,यही समझ विकसित कर पाये है और अनररष्ट्रीय स्तर में पर्यावरण संरक्षण स्वतः न करने वाले राष्ट्र दूसरे राष्ट्र को दोषी ठहराओ यही वातावरण बना पाए है।प्रसंशा समाज के उन चौकीदारों की होनी चाहिए जो भावुक स्वभाव के है, प्रकृति प्रेम के कारण पौधे लगाए पड़े है।मगर ये प्रेम कैसा प्रेम वास्तव में शारीरिक आकर्षण नही है,किसी से लम्बे वक्त के लिए निभाना हो तो दूसरे के हृदय की गहराइयों को पढ़ लेना है।लोग कहते है स्त्री के हृदय को आजतक कोई पढ़ नही पाया और धरती माँ के लिए भी यही सत्य नजर आता है।वो जननी है पालनहार भी,मगर आदर्श परम्पतिक भारतीय समाज की वो नारी की तरह है जो अपने सपनो का बलिदान देती रही है।गहराई वाली बात छोड़ सीधी बात यह है कि धरती माँ का कर्ज चुकाने के लिये सोचे तब खयाल रहे की सुबह घर से पाव बाहर रखते ही अपनी गाड़ी का सेल्फ दबाते है ,प्रकृति का दोहन करना शुरू कर देते है । हवा में कार्बन मिलाते हुए दिनभर की दौड़ भाग और समान की पन्नी बटोरते घर वापसी तक बहुत कुछ असन्तुलित कर चुके होते है ,इस काम मे हम अकेले नही होते इसलिए गलती का अहसाह की नही होता कि इस एक दिन के बदले में कितने पेड़ लगाने होंगे। फिर तो जिंदगी के इतने साल गुजर ही गए है,कहि ऐसा न हो कि बीज तो लगाए लेकिन अंकुरित ही न हो ,ये आने वाले समय की समस्या है,अभी कर्तव्य पथगामियो का मन पेड़ लगाने पर केंद्रित है,अभी हम समाज मे पर्यावण संरक्षण पर प्राथमिक स्तर की ही पर्यावरणीय सोच विकसित कर सके है जबकि देर तो यहा भी हो चुकी है।हम तकनीकी युग मे है और उसी के भरोसे आगे अच्छे परिणाम के लिए विश्वस्त है।,इसे ही कहते है जागते हुए सपने देखना।बात अच्छी भी है और सच्ची भी ,भले ही हमे कभी पौधे लगाकर सजग होने के प्रदर्शन का सौभाग्य न मिला हो मगर अपनी ओर से गंदगी न फैलाये,संसाधनों के दोहन पर लगाम लगाए,अपनी प्रकृतिप्रेमी प्रकृति विकसित करें ,नदी का जीवन बचाये, मासूमियत से टूकते वन्यजीवों को बचाये,सामूहिक हितों के लिए हाथ से हाथ मिलाये,ख़ुद समझे दूसरो को समझाए।मगर अचानक हृदय की वेदना से उठती धरती से एक आवाज आई बाबूजी,बस करो मार डालो क्या,मुझसे इतना ……….।मगर बाबू जी मुझे दुश्मनो से डर नही लगता ।मुझे तो अपनो से डर लगता है। ……….. अखिलेश उपाध्याय

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