” पिता “

एक धीर गंभीर शब्द जिसमें सफलता,धैर्य, साहस, उमंग, दया,प्यार, संघर्ष, उत्साह ओर ना जाने कितनी भावनाएं छुपी हुई है।एक परिवार रुपी इमारत में सबसे मजबूत उसकी नींव होती है, ओर ये भूमिका उस परिवार के पिता की होती है। नींव जितनी मजबूत इमारत उतनी भव्य । पिता अपने आपको उसी नींव की तरह जमीन मे दबा लेता है। ताकी परिवार रूपी इमारत भव्य रह सके।पिता अपनी आवश्यकताओं को कम करके अपने संघर्ष की ताकत बढ़ाते है, ओर परिवार की सारी आवश्यकताओ को समय रहते पूरा करते है।पिता की भूमिका उस वट वृक्ष की तरह होती है जो अपनी शाखाओं से निकलने वाली जड़ो को तब तक सींचता है जब तक जड़ जमीन में अपने आप को जमा ना लें।पिता क्रोध है, तो अनुशासन भी है, पिता खर्चों पर अंकुश है, तो भविष्य की योजना भी है, पिता डांटते है तो सफलता के पथ प्रदर्शक भी है। पिता कटु वचन है, तो पिता मर्मस्पर्शी संवेदना भी है ।।”पिता कि भूमिका को शब्दों में बंधना उतना ही कठिन है जितना की सागर को गागर में भरना।

निधि वरुण नीखर , मंडला

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