श्री विष्णु अवतार – 3/24

‘भगवान नारद अवतार’


भगवान नारद देवऋषि के रूप में भी विख्यात हैं। हर पल अखंड नारायण नारायण का जाप करते हुए सकल ब्रह्मांड में विचरण करते रहते हैं। पुराणानुसार इन्हें भगवान विष्णुअंश युक्त परमपिता ब्रह्मा का मानस पुत्र भी कहा गया है।
इन्हें, अगाधबोध, सकल रहस्यों का वेत्ता, पर और अपर ब्रह्म में निष्णात, सूर्यतुल्य त्रिलोकी पर्यटक, वायुवत सबके अंदर विचरण करने वाले और आत्मसाक्षी कहा गया।
एक श्रुति के अनुसार जब सृष्टि प्रणेता दक्ष ने वीरण प्रजापति की पुत्री असिक्नी से प्रथम दस हजार पुत्रों की उत्पत्ति की तो इन्होंने उन्हें निवृत्तिपरक उपदेश देकर सृष्टिसृजन मार्ग से विरत कर दिया।
ऐसा ज्ञात होने पर दक्ष प्रजापति ने पुनः सैकड़ों पुत्र उत्पन्न किये जिन्हें इन्होंने पुनः उसी मार्ग पर भेज दिया। तब दुखी होकर दक्ष ने इन्हें गोदोहन में लगने वाले समय के बराबर समय तक ही किसी एक स्थान पर ठहर सकने का शाप दे दिया। जिसके कारण नारद किसी एक स्थान पर ज्यादा समय तक नहीं रुक सकते।
इन्होंने ब्रह्मा जी से संगीत की शिक्षा ग्रहण की। यह वेदांत, योग, ज्योतिष, संगीत, वैद्यकी आदि के मूल आचार्य थे तथा भक्तिमार्ग के मुख्याचार्य थे। इनके द्वारा रचित पंचरात्र शास्त्र भागवत मार्ग का मुख्य ग्रंथ है। भगवत्कृपा के चलते ही नारद सुर तथा असुर दोनों के पूजनीय थे।
यह त्रैलोक के विशिष्ट समाचारदाता भी हुआ करते थे। मन की गति से विचरण करते हुए पूरे ब्रह्मांड के शुभाशुभ समाचार भगवान विष्णु के पास पहुंचाने में सिद्धस्त थे। कुछ ग्रंथों में नारदजी को कलहप्रिय देवऋषि भी कहा गया है।
विशद ज्ञानी और भगवान विष्णुभक्ति के अगाध प्रेमी होने कारण यह भगवान विष्णु अवतारी कहे गए।
 : आर.के.शुक्ला    लखनऊ,उत्तरप्रदेश.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here