शरद पूर्णिमा की रात में होती है अमृत वर्षा जाने कैसे होगी निरोगी काया की प्राप्ति- पंडित चितरंजन प्रसाद तिवारी

शरद पूर्णिमा पर्व का धार्मिक महत्व बहुत अधिक है जिसके अनुसार 4 महीने की वर्षा से साफ ऊपर आकाश का सारा प्रदूषण और गंदगी साफ हो जाती है जिसके बाद शरद ऋतु की शुरुआत में यह पूर्णिमा आती है जिसके चलते चंद्रमा की उज्जवल और ओज पूर्ण किरणें सीधे पृथ्वी पर पड़ती है ,पंडित चितरंजन तिवारी के अनुशार चंद्रमा को जीव जंतु और पेड़ पौधों के लिए वृद्धि कारक माना गया है ऐसे में पूर्णिमा के रोज चंद्रमा की किरणों से जो ऊर्जा का संचार होता है वह किसी अमृत से कम नहीं जो सभी तरह की बीमारियों को दूर करने वाली साथ ही चित्त की चंचलता को भी शांत करने वाली होती है धर्म ग्रंथों के अनुसार इस दिन सफेद वस्त्र धारण करने चाहिए क्योंकि इससे चंद्रमा की किरणें ज्यादा आकर्षित होती हैं ।

पर्व का विधान– चितरंजन तिवारी के द्वारा बताए गए धार्मिक विधानों के अनुसार पूर्णिमा की रात्रि को गाय के दूध की खीर बनाकर अपने आराध्य देवी देवताओं को चढ़ाने के बाद उसे खुली चांदनी में आधी रात तक खुले बर्तन में रखना चाहिए जिससे खीर चंद्रमा की जायदा किरणों के संपर्क में आकर अमृत के से प्रभाव की हो जाती है जिसके बाद इस खीर का प्रसाद ग्रहण करना चाहिए जो बहुत लाभकारी होता है ।

वैज्ञानिक महत्व –हमारे धार्मिक ग्रंथों ने प्रकृति को धर्म से जोड़ कर उसके महत्व को बताया है जिसका वैज्ञानिक दृष्टि से भी काफी महत्व है शरद पूर्णिमा की रात को खीर जो दूध और चावल से बनी होती है उसे चंद्रमा की किरणों में रखने का विधान बताया गया है दूध में लैक्टिक नाम का अम्ल होता है जो चंद्रमा की किरणों को ज्यादा मात्रा में शोषित करता है और चावल में होने वाले स्टार्च के कारण यह प्रक्रिया और भी आसान हो जाती है वहीं चांदी के पात्र में रोग प्रतिरोधक क्षमता होती है जिसके चलते ऋषि-मुनियों ने इस दिन खीर के महत्व को धर्म से जोड़ते हुए मनुष्यों के निरोगी काया के उपाय खोजे हैं।

पंडित चितरंजन प्रसाद तिवारी

वस्तूशास्त्री,धर्म विचारक,सर्वोत्तम हिंदी पंचांग

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