महाराष्ट्र : विशेष टिप्पणी

‘इधर चला,मैं.. उधर चला,ना जाने,मैं.. किधर चला..’

बहुत ही लोकप्रिय मुहावरा है..’खग की भाषा,खग ही जाने’..महाराष्ट्र में सरकार बनाने की ऊहापोह और अपने-अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए आपसी सहमति आते उतार-चढ़ाव के बीच राजनीतिक दलों के बीच खींचतान जनता देख रही थी।कभी इधर चला,..कभी उधर चला..ना जाने मैं किधर चला..!!देश की जनता हमेशा से देखा है,कि राजनीतिक गठबंधन करने वाले दलों और नेताओं का कोई ईमान धरम नहीं होता है।वे हरदम स्वंयम को सही ठहराते हैं।विचारधाराओं और सिद्धांतों की बात करने वाले ये राजनीतिक लोग,अपने निजी स्वार्थों के लिए,सब कुछ ताक पर रख देते हैं।..और बड़ी बेशर्मी के साथ जनता और देश/प्रदेश की दुहाई देते हुए अपने त्याग की कहानी सुनाने लगते हैं।हर बार एक रटा रटाया व्यंग्यात्मक बयान..’राजनीति में कोई भी परमानेंट दोस्त या दुश्मन नहीं होता है!!’आज इन्हीं सब बातों की पुनरावृत्ति हुई है।चुनाव पूर्व बने गठबंधन का टूटना और अपनी पार्टी विचारधारा के घोर विरोधी दल के साथ सरकार बनाने के लिए प्रयासरत होना,अपने आप में यह बताने के लिए काफी है,कि इन राजनीतिक दलों को जनता की कितनी फ़िक्र रहती है।मुख्यमंत्री पद की महत्वकांक्षा को लेकर शुरू हुआ विवाद,अंततः महाराष्ट्र के सभी प्रमुख दलों को जनता के बीच बेपर्दा कर गया।कट्टर हिंदुत्व के सिद्धांतों को लेकर जन्मी ‘शिवसेना’ अपनी मिट्टी पलीद करवा गई।भाजपा-एनसीपी गठबंधन की सरकार बनते ही महाराष्ट्र की राजनीति में भूचाल आ गया है।देवेंद्र फडणवीस का मुख्यमंत्री बनने और अजीत पवार का उप मुख्यमंत्री पद की शपथ लेना, बहुत से लोगों के राजनीतिक जीवन को अंधकारमय कर गया है।राजनीति के जानकारों का मानना है,कि ‘अजित पवार’ ने एनसीपी प्रमुख शरद पवार से बग़ावत कर,यह निर्णय लिया है।शरद पवार अपने भतीजे अजीत पवार से नाराज हैं।कितने नाराज हैं,यह तो आने वाला वक्त बताएगा।किन्तु,शरद पवार का जो राजनीतिक चरित्र है,उसे देखते हुए,यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है,कि शरद पवार की नाराजगी बिलकुल वैसी ही जैसी काँग्रेस की नाराजगी अपने विवादित बयानबाजी करने वाले नेताओं से होती है।क्या,काँग्रेस का कोई भी नेता सोनिया या राहुल गांधी की सहमति के बिना किसी प्रकार का कोई बयान दे सकता है?विवादित बयानों पर जनता की प्रतिक्रिया देखने के पश्चात काँग्रेस यह तय करती है,कि उस विवादित बोल के समर्थन में खड़े रहना है,या उस से पल्ला झाड़ लेना है।ठीक,उसी तर्ज पर महाराष्ट्र सरकार गठन में पूरी स्क्रिप्ट शरद पवार द्वारा लिखी गई है।अजीत पवार,वही कुछ कर रहे हैं,जो पार्टी प्रमुख शरद पवार ने कहा होगा।यदि,महाराष्ट्र की जनता देवेंद्र फडणवीस-अजीत पवार की जोड़ी को अपना समर्थन दे देती है,तो शरद पवार खुलकर सामने आ जायेंगे।किन्तु,किसी कारणवश यह गठबंधन सफ़ल नहीं हो पाया,तो शरद पवार के पास एक विकल्प ‘यूपीए’ का सहयोगी बने रहने का सुरक्षित रहेगा।सूत्र बताते हैं,कि अजीत पवार ने राज्यपाल को एनसीपी के 56 विधायकों का हस्ताक्षर युक्त समर्थन पत्र सौंपा है।इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ी किरकिरी ‘उद्धव ठाकरे’ और ‘सजंय राउत’ की हुई है।उद्धव की ज़िद और संजय राऊत के बड़बोलेपन ने ‘शिवसेना’ का बंटाधार कर दिया है।अतिमहत्वकांक्षी ज़िद के चलते ‘शिवसेना’ प्रमुख उद्धव ठाकरे ने अपने पिता स्व.बाला साहेब ठाकरे की वर्षों की मेहनत से खड़ी की ‘शिवसेना’ को जमींदोज कर दिया।पार्टी के सिद्धांतों को एक ही झटके में दूर कर दिया।वहीं दूसरी ओर ‘काँग्रेस’ की स्थिति भी कुछ बेहतर नहीं नहीं है।उसकी अनिर्णय की अवस्था ने,आज यह परिस्थिति निर्मित की।यदि,वक्त रहते काँग्रेस के शीर्ष नेताओं ने फ़ैसला लिया होता,तो राष्ट्रपति शासन लगने के पहले ही महाराष्ट्र में सरकार बन चुकी होती।लेकिन,सबके अपने-अपने राजनीतिक स्वार्थ थे।हर कोई मलाई खाने का इच्छुक था।बाँटने का नहीं।इसलिए गठबंधन में आपसी सहमति को लेकर इतनी उलझने उत्पन्न होती चली गईं।अब सबसे बड़ा खतरा ‘शिवसेना-काँग्रेस’ के लिए पैदा हो गया है।उनके जो विधयाक काँग्रेस-शिवसेना-एनसीपी’ गठबंधन के विरोध में थे,उनको पार्टी में बनाये रख पाने में पार्टी प्रमुखों को पापड़ बेलने पड़ेंगे।भगदड़ मचना तय है।जब कोई पार्टी या नेता अपने सिद्धांतों से पल्ला झाड़ते हुए,कुर्सी के पीछे भागता है,तो विधायकों की भगदड़ होना अपेक्षित होता है।कुल मिलाकर सत्य यह है,कि महाराष्ट्र में सरकार गठित हो चुकी है।शपथ ली जा चुकी है।अब,केवल भावनात्मक बयानबाजी,सिद्धांतों पर शहादत की बातें।लोकतंत्र की हत्या,हिटलर शाही..तानाशाही.. करोड़ों की विधयाक ख़रीदी.. यह सब आरोप-प्रत्यारोप सुनने के लिए तैयार रहिये।क्योंकि,आप जनता हैं!!सुनना.. आपका जनमसिद्ध अधिकार है।यह अधिकार के संविधान ने आपको दिया हुआ।बोलना नहीं,क्योंकि,..’बोलने का संवैधानिक अधिकार…देश के कुछ विशेष लोगों/वर्ग तक ही सीमित है।

राकेश झा 

मण्डला,मध्यप्रदेश

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