‘बलात्कार के अपराध पर भेदभाव,किसलिये’


जब हंगामा खड़ा करना ही मक़सद हो,तो समस्या का निराकरण कैसे होगा?हैदराबाद से उठी आक्रोश की लपटों ने पूरे देश की जनता को झकझोर दिया।उन्नाव की बलात्कार पीड़िता के साथ हुए अपराध और उसकी मौत ने जनमानस को झुलसा दिया।लेकिन,ये राजनीतिक दलों के नेता,ना जाने किस मिट्टी के बने होते हैं,इनको केवल राजनीति आती है।आज उन्नाव और लखनऊ में काँग्रेस,सपा के नेता-कार्यकर्ता सड़कों पर आ गए।बसपा प्रमुख मायावती यूपी के राज्यपाल से मिलने पहुँची।किन्तु,मुद्दा अपराधों पर रोकथाम या अपराधियों को कड़ी सज़ा की माँग नहीं था।इन सबका मुद्दा था,यूपी की योगी सरकार प्रशासनिक रूप से नाकाम है।भाजपा सरकार निकम्मी है।देश के राजनीतिक दलों का यह रवैया सर्वदा शर्मनाक रहा है,आज भी है।       महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराधों के लिए हर राजनीतिक दल जिम्मेदार है।बलात्कारियों और अपराधियों को संरक्षण देने में कोई भी राजनीतिक दल अपने आप को दूध का धुला नहीं बता सकता।चाहे वो कोई भी दल हो।संकीर्ण सोच और सत्ता प्राप्ति के मोह में सभी दलों ने कई बार अपने कार्यकर्ताओं की आवाज़ को दबाते हुए फ़ैसले किये हैं।हर पार्टी यह कहती है,कि बलात्कार एक घृणित अमानवीय अपराध है।इस पर राजनीति नहीं होनी चाहिए।लेकिन,हमाम है,साहब!!कपड़े तो उतारने ही पड़ते हैं।हैदराबाद की घटना में किसी भी राजनीतिक दल ने तेलंगाना के मुख्यमंत्री या सरकार के बारे में कुछ नहीं कहा।सब मौन थे।सबकि नज़रों में पुलिस की नाकामयाबी थी।अच्छा लगा,कि राजनीतिक दलों में कुछ मानवीयता बची हुई है।किंतु,यूपी की घटना सामने आते ही,सबका नज़रिया बदल गया।क्योंकि,नेताओं को राजनीति की संभावना दिखाई पड़ने लगी।            आज यूपी पुलिस से अधिक योगी सरकार को आरोपी बनाने में राजनीतिक लाभ मिलने की सम्भावनायें नज़र आ रही हैं।इसलिए प्रियंका गांधी,मायावती और अखिलेश यादव पीड़ित युवती के परिवार के प्रति संवेदना प्रकट करने से अधिक,यूपी सरकार को कोस रहे हैं।चूँकि,उन्नाव पीड़ित की दर्दनाक मृत्यु हो चुकी है।इसलिए राजनीतिक फायदा देखा का रहा है।यूपी के आगामी विधानसभा चुनावों पर निगाहें टिकी हुई हैं।राजस्थान से भी बलात्कार की लगातार खबरें आती रहती हैं।मध्यप्रदेश के आज के समाचार पत्रों के मुख्य पृष्ठ पर ही दमोह,बालाघाट और सीधी से बलात्कार और हत्या के समाचर लगे हुए हैं।क्या,यह अपराध नहीं है?महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधों में प्रदेश की सरकारों की चुनाव चिन्ह क्यों देखे जा रहे हैं?ये राजनीतिक दल इतनी बेशर्मी के साथ,जन भावनाओं से खिलवाड़ क्यों करते हैं?पुरुष नेताओं के दोहरे चरित्र तो फिर भी समझ आते हैं,परन्तु महिला नेत्रियों का दलगत प्रदर्शन किसलिये?कम से कम महिला नेत्रियों को तो,एकजुट होकर महिलाओं के हक़ में आवाज़ उठाना चाहिए।राजनीतिक पतन की कोई तो सीमा तय करो।यह माँग क्यों नहीं उठती कि, बलात्कारी के लिए एक ही सज़ा हो..’मौत’…अपराधी किसी भी उम्र का हो,इस अपराध की एक मात्र सज़ा ‘मौत’..आख़िर कब तक,देश की बच्चियाँ और महिलायें यह दर्द सहती रहेंगी!!           क्या,देश की जनता यह भूल सकती है,कि बलात्कारियों को देश के राजनीतिक दल बड़े गर्व के साथ टिकिट देते हैं।उन्हें बचाने के लिए,जी जान एक कर देते हैं।हर बार किसी पीड़िता की मौत पर घड़ियाली आंसू बहाते हुए,सियासत चमकाने के लिए चले आते हैं।यदि,ऐसा लगता है,कि देश के संविधान में कमियाँ हैं,तो उन कमियों को दूर करने के लिए प्रयास क्यों नहीं किये जाते?मॉब लिंचिंग से हर राजनीतिक दल,तथाकथित बुद्धिजीवी, फिल्मी कलाकार,एनजीओ,एक्टिविस्ट,सामाजिक संगठन सब को बहुत तक़लीफ़ होती है।तब यह देश रहने लायक नहीं लगता।घर से निकलने में डर लगने लगता है।बोलने-खाने में डर लगता है।इस तरह की तमाम बयानबाजियां करने वालों को हर बात की आज़ादी चाहिए होती है।लेकिन,महिलाओं के प्रति इतने घृणित अपराध पर देश के संविधान में खामियाँ दिखाई नहीं देती हैं।        बात फिर से वहीं पहुंचती है,कि आतंकवादी को बचाने के लिए न्यायालय आधी रात को सुनवाई कर सकते हैं।प्रदेश सरकार बचाने गिराने के लिए राजनीतिक दलों की सुनवाई तुरन्त हो सकती है,लेकिन एक बलात्कार पीड़ित युवती के लिए,सिर्फ़ तारीखें दी जाए,..यह कहाँ तक उचित है?उन्नाव केस में पीड़िता और उसका परिवार एक साल से कोर्ट के चक्कर काट रहा था।दो आरोपियों को ज़मानत मिली और जो कुछ हुआ,वह सबके सामने है।    आखिर किसको दोष देंगे?क्या हर किसी को मरने के बाद ही इंसाफ़ और न्याय की माँग उठेगी?आज विपक्षी और सत्ताधारी दोनों के नेता सहानुभूति दिखाने का प्रयास कर रहे हैं।यह सहानुभूति पहले क्यों नहीं जागी?एक साल मतलब बारह महीने अर्थात तीन सौ पैंसठ दिन..इतने समय तक सहानुभूति,दर्द कहीं सोया पड़ा था।जैसे ही पीड़िता की मौत की खबर आई,..दर्द जाग गया।अगर,जनप्रतिनिधियों का यही रवैया रहा और न्यायपालिका से न्याय मिलने में दशकों लगेंगे,तो ज़नाब…मॉब लिंचिंग होना कोई अजूबा नहीं।जनता को क़ानून हाथ में लेने के लिए,आप लोग ही मजबूर कर रहे हो!!

राकेश झा

सम्पादक

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