लाचार गौवंश के आशियाने ‘धेनुवाड़ी’ को सरकार से मदद की दरकार

मंडला जिले के सेमरखापा गांव में है धेनुवाड़ी गौशाला जिसे गांव की कुछ महिलाएं अपने खर्च पर संचालित करती हैं. गौशाला में करीब 50 गाय हैं. आठ साल पहले चालू हुई गौशाला आज भारी आर्थिक संकट से जूझ रही है और उसे समाज और सरकार से मदद की दरकार है.

आदिवासी बाहुल्य मंडला जिले के सेमरखापा गांव में मौजूद धेनुवाड़ी गौशाला बीमार, लाचार बुजुर्ग, विकलांग और आवारा गायों का आशियाना बन चुकी है. ये सब कुछ यहाँ रहने वाली निशा ठाकुर की सोच के चलते ही संभव हो पाया. निशा ने धेनुवाड़ी का जिम्मा अपने कंधों पर लिया और उनकी मेहनत भी रंग लाई. आज इस धेनुवाड़ी में 48 गौवंश को एक तरह से नया जीवन दिया जा रहा है.

गोशाला को मदद की दरकार

सेमरखापा गांव में मौजूद धेनुवाड़ी गौशाला की नींव 8 साल पहले गांव की महिलाओं ने रखी. जिसमें 10 सदस्य हैं जो हर माह 100 रुपये अपने तरफ से देती ही हैं साथ ही समाज से भी मदद लाने का प्रयास भी करती हैं और यहाँ खुद लाचार, बीमार, बुजुर्ग और विकलांग गौवंश की सेवा करती है.लेकिन इन महिलाओं ने बताया कि समाज से इन्हें बस न के बराबर ही मदद मिलती है उल्टे लोग यहाँ अपने ऐसे मवेशी को जबरन छोड़ जाते है जो उनके काम के नहीं होते साथ ही अपने गौवंश को छोड़ने के बाद यहाँ पलट कर कभी नहीं आते।दूसरी तरफ इतने मवेशी और सब होने के बाद भी सरकार की तरफ से धेनुवाड़ी को कोई सहायता नहीं मिल रही है. धेनुवाड़ी को संचालित करने वाली महिलाएं इसके लिए कई बार सरकारी ऑफिसों के चक्कर काट चुकी हैं. बावजूद हालत जस के तस हैं. यही वजह है कि धेनुवाड़ी को आज आर्थिक मदद की दरकार है.लेकिन सरकारी विभाग और जिम्मदारों के अपने मापदंड हैं, धेनुवाड़ी गौशाला आज भारी आर्थिक संकट से जूझ रही है, ऐसे में समाज के अलावा शासन, प्रशासन को धेनुवाड़ी की मदद के लिए आगे आना चाहिए.

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