माँ की परछाईं

“माँ माँ देखो मुझे तो धूप भी नहीं लग रही”
“देखो न माँ मेरी तो परछाईं भी नहीं है”
“माँ देखो न”
कह कर हंसती हुई मुनिया भरी दोपहरी सड़क पर चलती हुई अपनी माँ की ओट में धूप से बचती जा रही थी और माँ की उंगली थामे इठला कर चल रही थी।
माँ ने कहा
“हाँ मुनिया तू ऐसे ही मेरी परछाईं में छुप कर चल। तपती धूप तेरा कुछ न बिगाड़ पाएगी।”
“मेरी चांद सी गुड़िया का रंग भी न कुम्हलाएगा। “
कहते हुए माँ ने अपना पल्ला भी मुनिया के सर पर डाल दिया था।

सामने पड़े एक पत्थर के टुकड़े से ठोकर लगने पर मालिनी की तंद्रा भंग हुई।
मई की भरी दोपहरी में मालिनी एक दफ्तर से इंटरव्यू देकर लौट रही थी तेजधूप में उसने अपनी चुनरी अपने सिर पर डाली हुई थी। मन इसी उधेड़बुन में था कि आज नौकरी मिलेगी कि नहीं। वह जानती थी कि यदि आज भी नौकरी न मिली तो माँ की बीमारी के लिये पैसे नहीं आ पाएंगे। उसे पढ़ाते लिखाते माँ ने अपने धन के साथ अपना तन भी गंवा दिया था। जब तक वह स्वयं से माँ की तकलीफें न समझने लगी तब तक माँ ने उससे अपनी कोई पीड़ा कभी नहीं कही। बीमार रह कर भी खुद ही काम करती रहती। बुखार में भी लोगों के घरों के बर्तन मांजती ,कपड़े धोती पर मुझे प्राइवेट स्कूल में पढ़ाती। मेरी फीस भरती। और मुझे पढ़ने के लिये प्रोत्साहित करती। माँ का
टी बी से ग्रसित चेहरा मुझे ग्लानि से भर देता था। उनका रात भर खाँसना मेरी रातों की नींद उड़ा देता था। दवाई तो फिर भी सरकारी अस्पताल से ले आती थी पर अच्छी खुराक के लिये पैसे कहाँ से आएं।
माँ मुझे बर्तन कपड़ा का काम करने नहीं देती थी। कहती थी
मेरी परछाईं से दूर ही रहना ये काम तू कभी नहीं करना।
अब मैं तुम्हें कैसे बताऊं माँ तुम्हारी परछाईं में कितना सुकून मिलता है मुझको।
“तू पढ़ लिख गई है मुनिया अब तू मेरी तरह जूठे बर्तन नहीं मांजेगी।”
मैं उनसे कैसे कहूँ कि BSc करने के बाद भी कोई नौकरी नहीं मिलती माँ।
एक दो गरीब बच्चों की ट्यूशन से जो मिल जाता था वही जीवन का सहारा था ।पर पर्याप्त नहीं।
बस स्टॉप पर बस के रुकते ही वो बैठ गई।
पर आज वो इंटरव्यू में कुछ अजीब से ही सवाल पूछ रहा था।
परछाईं का अर्थ क्यों पूछ रहा था वो? बैठे बैठे वो सोचने लगी।
पर जवाब तो मैंने भी आज अच्छा ही दिया शायद।जब मैंने कहा “परछाईं उसी व्यक्ति की सार्थक होती है जो स्वयं धूप में तपता है और दूसरों को छाया देता है । “
ये कहते हुए मुझे माँ ही याद आ गई थी और मैंने धीरे से अपनी आंखों की कोर की नमी पोंछ ली थी।पर ये भी देखा था कि सामने वाले की आंखों में प्रशंसा के भाव थे।
अचानक मैं वर्तमान में फिर लौट आई मेरी बस रुकी थी । मेरा स्टॉप आ गया था। मैं उतर कर थके कदमों से घर की गली में मुड़ गई। तभी मोबाइल की घंटी बज उठी। पर्स से निकाल कर देखा तो आफिस से ही था। मैंने कहा
“नमस्कार सर “
“मालिनी जी बधाई आपको आप कल से ज्वॉइन कर सकती हैं। आपके वेतन होगा 22000 रुपये”
” ज ज जी…
जी थैंक यू सर..
थैंक यू वेरी मच सर..
आपका बहुत बहुत आभार”

“मालिनी जी आप आभार व्यक्त करें उस मेहनत कश परछाईं का”
“आप कल से ज्वॉइन कर लें सुबह 10 बजे से”

फोन कट चुका था वो घर की तरफ दौड़ी माँ अभी भी धूप में खड़ी उसका इंतजार कर रही थी। मुनिया जाकर माँ का के कदमों तले लोट गई ।एक बार फिर उनकी परछाईं में खुद को छुपा लिया था।

अर्चना जैन
मंडला

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