‘कलियुग निवास’


द्वापर में कृष्ण भगवान के पृथ्वी पर अवतार लेने और अधर्म का समूल नाश करके धर्म की चतुर्दिक स्थापना कर देने के कारण पृथ्वी पर स्थापित होने और रहने के लिए कलियुग की हिम्मत ही नहीं पड़ रही थी।
इसके अतिरिक्त परम् प्रतापी श्रीकृष्ण भगवान के कृपापात्र धर्मावलंबी राजा परीक्षित का अति न्यायपूर्ण शासन भी कलियुग के पृथ्वी में बढ़ते कदमो को रोक रहा था। किन्तु विधि के विधान के अनुसार कलियुग की पृथ्वी पर स्थापना द्वापर युग के बाद होना अनिवार्य थी। 
सो राजा परीक्षित ने काफी विचार के बाद कलियुग का प्रवेश और निवास निम्न जगहों पर निर्धारित किया। और कहा कि हे कलिराज! तुम स्वच्छंद रूप से निम्न स्थानों पर निवास कर सकते हो :–
जिन भवनों में वास्तु दोष हो।
जिस रसोई में एक बार भोजन पका कर बिना उसे स्वच्छ किये पुनः भोजन पकाया जाये और अतिथि तथा गृह स्वामी उस भोजन को प्राप्त करें।
जिस गृह में ईश्वर के पूजा स्थान पर पादुका रखी जाएँ।
मांस, मदिरा, खाद्य और अखाद्य का विचार किये बगैर जहाँ मनुष्य हर तरह का भोजन पकाये और खाये।
जिस स्थान पर गोधन का अपमान होता हो।
पुनः धर्मात्मा राजा परीक्षित ने कहा कि जिस स्थान पर हरि कीर्तन हो रहा हो, ऋषि सत्संग हो रहा हो, श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन हो, यज्ञ हो रहा हो, मंदिर का निर्माण हो रहा हो, धर्मशाला और पौशाला का निर्माण हो और जहाँ धर्माचारी पुरुष निवास करते हों, वहां पर हे कलिकाल! कतई अपनी दृष्टि न डालना।
सत्य है कलिकाल अपने निर्धारित स्थानों पर ही आजतक स्थित है और प्रतिबंधित स्थानों पर उसका प्रभाव अति न्यून ही है।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

आर.के.शुक्ला

लखनऊ,उत्तरप्रदेश.

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