गरीबी और विकलांगता को मात देकर बनी अंतरराष्ट्रीय एथलीट,जमुना के हौसले को सलाम

होसलो की उड़ान – जमुना

मंडला जिले की जमुना उइके आज किसी पहचान की मोहताज नहीं लेकिन इसके पीछे है वह कड़ी मेहनत और बुलंद इरादे है जिससे हर कोई वाकिफ नहीं जिले के छोटे से गांव में गरीब परिवार में जन्म लेने की साथ ही एक हाथ से विकलांग जमुना को देख कर लोग यही कहते थे यह बच्ची बड़ी होकर आखिर कैसे संघर्ष कर सकेगी लेकिन शारीरिक विकलांगता को अपना हथियार बनाकर लेने वाली जमुना उइके पढ़ाई के साथ ही खेल के क्षेत्र में आगे बढ़ते हुए वह मुकाम पाया कि आज लोग उसकी मिसाल देते हैं गोला फेंक भाला फेंक और तवा फेंक जैसे एथलीट खेलों में महारत हासिल करने के लिए जमुना ने कड़ी मेहनत की और तहसील स्तर जिला स्तर के बाद राज्य स्तर में अपनी खेल का जौहर दिखाया सिवनी में अंतर राज्य मास्टर एथलीट प्रतियोगिता का हिस्सा बनकर यहां जमुना ने सामान्य खिलाड़ियों के बीच दो गोल्ड और एक सिल्वर मेडल अपने नाम किया जिसके बाद उनका चयन हरियाणा पंचकूला में होने वाली मास्टर राष्ट्रीय एथलीट प्रतियोगिता के लिए हुआ जहां उन्होंने कांस्य पदक जीतकर यह बता दिया कि सामान्य खिलाड़ियों के बीच भी वह किसी से कम नहीं इस प्रतियोगिता के बाद जमुना का चयन मॉरीशस में होने वाली अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता के लिए हुआ था लेकिन कोरोनावायरस के चलते यह प्रतियोगिता स्थगित हो गई ।

यह कहानी है उस बुलंद इरादे और हौसले की जिसके आगे जमुना ने हार नहीं मानी और सफलता को उसके कदम चूमने के लिए मजबूर होना पड़ा गरीबी के साथ ही विकलांगता से लड़ते हुए बिना किसी सरकारी मदद के जमुना ने जो मुकाम हासिल किया है वह काबिले तारीफ तो है लेकिन कहीं ना कहीं जमुना को इस बात का दर्द है कि आदिवासी समाज से आने के साथ ही मास्टर डिग्री और खेल प्रतिभा की धनी होने के बाद भी उनके पास एक सरकारी नौकरी ही नहीं रपटा घाट के वृद्ध आश्रम में एक छोटी सी नौकरी करने वाली जमुना का कहना है कि जब तक वह है तब तक संघर्ष करती रहेंगी और अपने खेल को नया आयाम देने की कोशिश करती रहेंगी।

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