सिर्फ नागपंचमी में ही खुलते है इस मंदिर के कपाट – आखिर क्यों ..?

सनातन नगरी के रुप में प्रसिद्ध उज्जैन स्थित नागचन्द्रेश्वर मंदिर देश का एक ऐसा मंदिर है जिसके कपाट साल में केवल एक दिन के लिए खोले जाते हैं.

भारत में बद्रीनाथ, केदारनाथ, यमुनोत्री, गंगोत्री, अमरनाथ आदि कुछ ऐसे तीर्थस्थल हैं, जहां मंदिरों के कपाट कुछ महीनों के लिए खुले रहते हैं. दुर्गम भौगोलिक स्थिति, बारिश, बर्फबारी और प्राकृतिक आपदा आदि के कारण ये निश्चित समय पर खुलते हैं और बंद होते हैं.

लेकिन सनातन नगरी के रुप में प्रसिद्ध उज्जैन स्थित नागचन्द्रेश्वर मंदिर देश का एक ऐसा मंदिर है जिसके कपाट साल में केवल एक दिन के लिए खोले जाते हैं. हालांकि यहां ऐसी कोई विषम भौगोलिक या प्राकृतिक परिस्थिति नहीं है, तब भी इस मंदिर के पट केवल सावन महीने में नागपंचमी के दिन खोले जाते हैं.

नागचन्द्रेश्वर मंदिर द्वादश ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर मंदिर के परिसर में सबसे ऊपर यानी तीसरे खंड में स्थित है. ग्यारहवीं शताब्दी के इस मंदिर में नाग पर आसीन शिव-पार्वती की अतिसुंदर प्रतिमा है, जिसके ऊपर छत्र के रूप में नागदेवता अपना फन फैलाए हुए हैं.

भगवान शिव के इस रुप को नागचन्द्रेश्वर महादेव कहा जाता है. यहां की परंपरा के अनुसार आम दर्शनार्थी नागचन्द्रेश्वर महादेव का दिव्य दर्शन वर्ष में केवल एक बार नागपंचमी पर्व के दिन ही कर पाते हैं.

गौरतलब है कि श्री महाकालेश्वर मंदिर तीन खंडों में बंटा है और इस मंदिर के विशाल प्रांगण पहली मंजिल पर भगवान महाकालेश्वर, दूसरी मंजिल पर श्री ओंकारेश्वर और तीसरी मंजिल पर भगवान नागचन्द्रेश्वर स्थापित हैं.

ऐतिहासिक साक्ष्य यह बताते हैं कि श्री नागचन्द्रेश्वर भगवान की प्रतिमा नेपाल से यहां लायी गयी थी. नागपंचमी पर्व के अवसर पर श्री महाकालेश्वर और श्री नागचंद्रेश्वर भगवान के दर्शन के लिए आए श्रद्धालुओं के लिए अलग-अलग प्रवेश की व्यवस्था की जाती है, ताकि किसी प्रकार की अव्यवस्था उत्पन्न न हो.

सिर्फ नागपंचमी पर खुलता है उज्जैन का यह मंदिर, इस बार ऑनलाइन दर्शन

श्रावण महीने की पंचमी को नाग पंचमी के रूप में मनाया जाता है, जो इस बार 25 जुलाई, शनिवार के दिन पड़ रही है। इस दिन पूरे देशभर में भक्त नागों की पूजा करते हैं। देश में सर्पों और नागों के कई मंदिर हैं, जहां लोग पूजा करने के लिए जाते हैं। मगर, इसमें सबसे खास और प्रसिद्ध है, उज्जैन के महाकाल मंदिर परिसर में तीसरी मंजिल में स्थित नागचंद्रेश्वर का मंदिर। यह दो वजहों से खास है, पहला यह है कि इसे साल में सिर्फ एक दिन के लिए ही नाग पंचमी पर दर्शन करने के लिए खोला जाता है। नागचंद्रेश्वर मंदिर की पूजा और व्यवस्था महानिर्वाणी अखाड़े के संन्यासियों द्वारा की जाती है।

यह पहली बार होगा जब कोरोना संक्रमण की वजह से मंदिर में श्रद्धालु नहीं आ सकेंगे। लिहाजा, मंदिर के ऑन-लाइन दर्शन के लिए इस बार व्यवस्था की गई है। श्रद्धालुओं के लिए मंदिर की वेबसाइट www.mahakaleshwar.nic.in और सोशल मीडिया पर ऑन लाइन दर्शन की व्यवस्था की जाएगी।

वहीं, दूसरी खास बात है इस मंदिर में रखी नाग चंद्रेश्वर की मूर्ति, जिसके बारे में कहा जाता है कि उसे नेपाल से 11वीं शताब्दी में लाया गया था। इस मूर्ति में दशमुखी शेष शैय्या पर विष्णु जी की जगह भोले नाथ को सपरिवार बैठे हुए दिखाया गया है। ऐसी कोई मूर्ति दुनिया में दूसरी जगह नहीं देखने को मिलेगी।

माता पार्वती और पुत्र गणेश के साथ इस मूर्ति में भोलेनाथ को सर्प शैय्या पर बैठे हुए दिखाया गया है, जिसमें उनके हाथों और गले में भी सर्पों की माला पड़ी हुई है। यह मूर्ति इतनी आकर्षक है कि इससे नजर ही नहीं हटती है।

मंदिर की दूसरी विशेषता

वहीं, एक मान्यता यह भी है कि यहां नागराज तक्षक स्वयं रहते हैं। सर्पराज ने भोलेनाथ को मनाने के लिए घोर तपस्या की थी, जिससे प्रसन्न होकर भोलेनाथ ने तक्षक उसकी इच्छा के अनुरूप अनपे सानिध्य में रहते हुए अमरत्व का वरदान दिया। मान्यता है कि उसके बाद से तक्षक महाकाल वन में वास करने लगा। उसकी मंशा थी कि उनके एकांत में विघ्न न हो, अत: वर्षों से यही प्रथा है कि मात्र नागपंचमी के दिन ही वे दर्शन को उपलब्ध होते हैं। शेष समय उनके सम्मान में मंदिर बंद रहता है।

सर्प दोषों से मिलती है मुक्ति

इस मंदिर में दर्शन करने के बाद व्यक्ति किसी भी तरह के सर्पदोष से मुक्त हो जाता है। लिहाजा, जिन्हें किसी भी तरह के सर्प दोष होते हैं या कुंडली में राहु-केतु की स्थिति खराब होती है उन्हें इस मंदिर में दर्शन करने के लिए कहा जाता है। इसलिए नागपंचमी के दिन खुलने वाले इस मंदिर के बाहर भक्तों की लंबी कतार लगी रहती है। एक अनुमान के मुताबिक, नाग पंचमी के एक दिन में यहां दो लाख से ज्यादा लोग दर्शन करते हैं।

कहा जाता है कि परमार राजा भोज ने 1050 ईस्वी के लगभग इस मंदिर का निर्माण करवाया था। इसके बाद सिं‍धिया घराने के महाराज राणोजी सिंधिया ने 1732 में महाकाल मंदिर का जीर्णोद्धार के साथ ही इस मंदिर का भी जीर्णोद्धार हुआ था।

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