‘नैमिषारण्य प्रसिद्धि प्रसंग’

नैमिषारण्य के घने, सुन्दर, समस्त फलदार वृक्षों, अन्य पेड़, पौधों, लतावल्लरियों, वनपशुओं से आवृत जंगल के मध्य में महात्मा गौरमुख का अतिरमणीय आश्रम था। यह स्थान साधुसंतों और तपस्वियों हेतु अत्यंत उपयुक्त माना जाता था। मुनि गौरमुख भी अपने तपस्वी शिष्यों, मुनियों सहित इस आश्रम में शांतिपूर्वक तपस्या में लीन रहते थे।
एकदिन परमप्रतापी राजा दुर्जय अपनी तमाम सेना के साथ, शाम के समय, उस आश्रम पधारे। सघनवन के मध्य एक अति रमणीय स्थान पर, मुनि के सुंदर आश्रम को देख, राजा ने मन में वहीँ पर रात्रि विश्राम करने का विचार आया। अपने अनुचरों को वैसा आदेश देकर राजादुर्जय आश्रम के अंदर गए।
राजा के आगमन का समाचार सुनकर गौरमुख मुनि ने अपने शिष्यों सहित आगे बढ़कर राजा की अगवानी की और राजा को आसान देकर बिठाया। राजा ने मुनि से उनके आश्रम के पास ही रात बिताने और सुबह प्रस्थान करने की अनुमति चाही। उन्होंने मुनि को आश्वस्त किया कि उनकी विशाल सेना के वहाँ रुकने और निवास करने के कारण आश्रम और मुनियों को किसीभी प्रकारका कोई व्यवधान न होगा। निर्धन ऋषि गौरमुख ने राजा के प्रस्ताव को सहर्ष स्वीकार करके समस्त सैन्यबल सहित राजा को रात्रि के भोजन का निमंत्रण दिया। 
तपोबलयुक्त ऋषि को तब चिंता हुई कि इतने मनुष्यों के भोजन का प्रबंध कैसे किया जाये। तभी आकाश मार्ग से वैकुण्ठधाम जाते हुए नारद ऋषि ने चिंतातुर मुनि गौरमुख को देखा। वह तुरंत मुनि के सम्मुख प्रकट हुए और बोले कि हे ऋषि! आप रंचमात्र की चिंता न करे। सिर्फ, अन्तर्मन से उन अविनाशी भगवान विष्णु की आराधना करें। वही उनके कष्टों का निवारण कर सकते हैं।
ब्रम्हर्षि नारद की बात मानकर ऋषि ने भगवान विष्णु की बड़े मनोयोग से स्तुति की। उनसे यह प्रार्थना की कि हे प्रभो! इतने अतिथियों के सत्कार और भोजन की व्यवस्था करने की कृपा करें। ऋषि की आर्तपुकार सुनकर भगवान विष्णु उनके सम्मुख प्रकट हुए। विनयावनत ऋषि के संकल्प को जानकार प्रभु विष्णु ने उन्हें एक अति दैदीप्यमान चिंतामणि रत्न प्रदान करते हुए कहा कि हे पुण्यात्मा ऋषि! यह मणि आपकी इच्छानुसार कार्य करने में सक्षम है। आप निर्भीक होकर राजा दुर्जय और उनकी सेना का उपयुक्त आतिथ्य सत्कार करो। ऐसा कहकर त्रिभुवन पति भगवान विष्णु अंतर्धान हो गए।
चिंतामणि प्राप्त करके मुनि ने समस्त अतिथियों को यथायोग्य भक्ष्य, भोज्य, लेह्य और चोष्य पदार्थ परोस कर राजा समेत सभी को सन्तुष्ट किया। भोजन प्राप्त करके संतुष्ट राजा निद्रा हेतु प्रथान किये। किन्तु मुनि गौरमुख की महिमा और चिंतामणि की उपादेयता को देख उन्हें रात भर नींद नहीं आयी। राजा दुर्जय रातभर यही सोचते रहे कि ऐसे मूल्यवान रत्न को तो राजा के पास होना चाहिए। इन ऋषियों, मुनियों को इस मायामोह से क्या लेना देना।
सुबहसुबह राजा ने वह स्थान छोड़ने के पूर्व अपने विरोचन नाम के मंत्री को बुलाकर आदेश दिया कि मुनि से वह रत्न प्राप्त करके उनके खजाने में रखा जाये। इसके लिया भले ही मुनि के साथ बल का प्रयोग ही क्यों न करना पड़े। विरोचन को मुनि के तपोबल का ज्ञान था। राजा के इस आदेश को उनके विनाश का कारण समझ वह मुनि के पास गया और सीधे राजा की बात कह सुनाई।
क्रोधित होकर मुनि ने मणि देने से मनाकर दिया। जब मंत्री के आदेश से सैनिक मुनि को मारने और मणि को बलात अपहरण करने के लिए आगे बढे तब उस मणि से हजारों की संख्या में बलवान योद्धा प्रकट हुए। उन्होंने विरोचन और उनके सैनिकों का सफाया कर दिया। राजा को जब यह समाचार प्राप्त हुआ तब वह अत्यंत क्रोधित होकर अपने अन्य सैनिकों और तमाम अन्य राक्षसों से युक्त सेना लेकर आश्रम पर धावा बोलने को तत्पर हुआ।
मुनि गौरमुख ने जब राजा के इस प्रयास को देखा तो चिंतित हुए बिना उन्होंने पुनः भगवान विष्णु का आवाहन किया। विष्णु भगवान अपने भक्त की पुकार सुनकर तुरन्त प्रकट हुए। सब कुछ जानते हुए भी भगवान विष्णु ने ऋषि गौरमुख से उस पुकार का प्रयोजन पूछा। ऋषि गौरमुख ने समस्त कथा संक्षेप में बताकर भगवान से उस दुष्ट राजा दुर्जय के विनाश की प्रार्थना की। 
भगवान तो वैसे भी अधर्मियों के विनाश हेतु तथा धर्म की स्थापना हेतु तत्पर रहते हैं। इसीलिए विष्णु भगवान ने अपने सुदर्शन चक्र से उस राजा दुर्जय को समस्त सैन्य दलबल सहित निमेष मात्र में ही नष्ट कर दिया। फिर, भगवान, गौरमुखऋषि की ओर देखकर बोले कि हे मुने! इन आततायियों का विनाश एक निमेष में हुआहै इसलिए इस क्षेत्रको आजसे नैमिषारण्य के नाम से जाना जायेगा और वह स्वयं इस क्षेत्र में यज्ञपुरुष के रुप में निवास करेंगे।
तब से आज तक इस क्षेत्र को नैमिषारण्य के नाम से ही जाना जाता है। इस संबंध में अन्य कई ईश्वरीय दिव्य कथाएं प्रचलित हैं जिनको हम सभी श्रद्धापूर्वक स्वीकारते है। यह कथा भी उनमें से एक है जो श्री वराह पुराण में वर्णित है।

आर.के.शुक्ला 

लखनऊ,यू.पी.

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