पधारो म्हारे मंडला में – विश्व पर्यटन दिवस पर विशेष

मंडला में प्रकृति ने दोनों हाथों से लुटाई हैं नेमतें, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पर्यटन का अद्भुत संगम

मंडला जिले में पर्यटन की असीम संभावनाएं हैं क्योंकि सतपुड़ा के जंगलों में प्रकृति का सौंदर्य है तो प्रकृति पुत्र आदिवासियों की परंपरा रीति रिवाज और जीवन शैली के साथ ही गोंड राजाओं की समृद्धशाली विरासत की निशानियां भी और करोड़ों साल पहले जीव-जंतुओं और पेड़ पौधों की गवाही भी. मीडिया टुडे मंडला जिले के कुछ अलग अलग ऐसे स्थानों से परिचय करा रहा है जो पर्यटन के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण हैं.

आदिवासियों की परम्परा, रीतिरिवाजों और संस्कृति को आज भी जिंदा रखे हुए मंडला जिले में प्रकृति ने दोनों हाथों से नेमतें लुटाई हैं, वहीं इस जिले का ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व भी कम नहीं है. राजा महाराजाओं के निर्माण से लेकर डायनोसोर और करोड़ों साल पुराने पेड़ पौधों की निशानियां यहां मिलती हैं. जरूरी है कान्हा के साथ ही उन स्थानों को भी महत्व दिए जाने का, जो आज भी पर्यटकों से अछूते हैं.

सहस्त्रधारा

सहस्त्रधारा

जिला मुख्यालय से करीब 5 किलोमीटर दूर यह वह स्थान है जहां नर्मदा नदी हजार धाराओं में बंट जाती है. कहा जाता है कि महाबली राजा सहस्त्रबाहु ने यहां नर्मदा जी को रोकने की कोशिश की, लेकिन वह नर्मदा के वेग को नहीं रोक पाए और नर्मदा नदी उनकी सहस्त्र भुजाओं के बीच से निकल कर निकल गईं. इस स्थान का जितना धार्मिक महत्व है उससे भी कहीं ज्यादा यहां की खूबसूरती लोगों को आकर्षित करती है.

गरम पानी का कुंड

गरम पानी का कुंड

मंडला से 20 किलोमीटर दूर नर्मदा नदी के बीचों बीच एक ऐसा स्थान है जहाँ के कुंड का पानी हमेसा ही गरम रहता है कहा जाता है कि सल्फर की अधिकता और ज्वालामुखी का मुँख होने के चलते यहाँ के पानी का तापमान औसत से 5-6 डिग्री ज्यादा ही होता है और लोग यहाँ गर्म पानी के कुंड में डुबकी लगा कर त्वचा संबंधी बीमारियों से निजात पाते हैं. साथ ही यहां मांगी मन्नतें भी पूरी होती है,एक ही स्थान पर उसी नर्मदा नदी का पानी गर्म होना किसी आश्चर्य से कम नहीं.

रामनगर के किले

मोती महल

मंडला पुराने समय में गौंड राजाओं की राजधानी थी, जिसे गढ़ा मण्डला के नाम से जाना जाता है और उन गौंड राजाओं की समृद्धशाली विरासत की निशानियां आज भी मंडला से करीब 30 किलोमीटर दूर नर्मदा के तट पर रामनगर में मौजूद हैं. यहां मोती महल, बेगम महल, दलबादल महल,रायभगत की कोठी बहुत ही अच्छी स्थिति में हैं और आदिवासी राजाओं के सबसे बड़े और और उस इतिहास की गवाह हैं.

जब मंडला में कला और निर्माण को नए आयाम मिले, इसके अलावा बहुत सी बावली और पुराने मंदिर भी मण्डला और इसके आसपास मौजूद हैं.

कालापहाड़

राम नगर से कुछ किलोमीटर दूर एक ऐसा पहाड़ है जो काले पत्थर से बना हुआ है और इसके हर इक पत्थर की बनावट ऐसी है जैसे किसी ने इन्हें तरासा हो काफी ऊंचाई और दूर से दिखाई दे जाने वाले इस पहाड़ को भगवान की तरह पूजा भी जाता है.

जबकि किवदंती है कि रामनगर के महलों का निर्माण इन्ही पत्थर से हुआ है और रामनगर के राजा जो बहुत बड़े तंत्र विद्या के साधक थे. इन पत्थरों को हवा में उड़ा कर निर्माण स्थल पर भेजते थे, दूसरी तरफ भौगोलिक जानकारों के अनुसार यहाँ सुप्त ज्वालामुखी है और काला पहाड़ जो खोखला है उसका मुख है और यह पहाड़ उसके लावा से बना है.

आज भी जिंदा हैं आदिवासियों की परम्पराएं

मंडला जिले में आज भी आदिवाशियों के रीतिरिवाज, संस्कृति और परम्पराएं जिंदा हैं, इस कम्प्यूटर युग में भी गोदना गौंड और बैगा जनजाति की महत्वपूर्ण परम्परा है. जिसे वे निभाते आ रहे हैं, इसके अलावा बिदरी के बिना फसलों की बुआई नहीं होती तो शैला नृत्य के बिना पैदावार की कटाई नहीं होती. बच्चे के जन्म से लेकर मृत्यु तक यहां रीतिरिवाजों और परम्पराओं को देखा जा सकता है. तो वहीं प्राचीन संस्कृति के तौर पर रीना, कर्मा, शैला जैसे नृत्य हर गम और खुशी के मौके पर आदिवासी समाज की एकता का बड़ा उदाहरण हैं. मंडला जिले में इसके अलावा भी इतना कुछ है, जिसे दूसरी जगहों पर खोज पाना मुश्किल है. लेकिन जिले को पर्यटन के लिहाज से वो स्थान आज तक नहीं मिला जो मिलना चाहिए, यदी एक बेहतर कार्ययोजना बना कर इन स्थलों को संवारने के साथ ही सुविधाओं और साधनों से जोड़ा जाए तो भारत के मानचित्र में इसे बेहतर स्थान मिलेगा ही साथ ही लोगों को रोजगार भी.

अजगर दादर

बम्हनी के पास एक ऐसा स्थान जहां हजारों की संख्या में अजगरों का आशियाना है. ठंड के मौषम में एक साथ अपने ठिकानों से बाहर निकल कर धूप सेंकते इन अजगरों को दर्जनों की संख्या में देखा जा सकता है,प्रकृति के जानकार बताते हैं कि इस पठार के नीचे चट्टानों के साथ ही खोखला स्थान है, जिसकी मिट्टी बाढ़ में बह गई थी.

यही वजह है कि यहां अजगरों ने अपनी बस्ती बसा ली है जिन्हें करीबी जंगल से छोटे पक्षी, खरगोश, गिलहरी या ऐसे जीव जंतु बड़ी आसानी से मिल जाते हैं कि अजगर दादर अजगरों के लिए आदर्श स्थान बन गया और यहां उनकी प्रजाति काफी सुरक्षित है.

जीवाश्म की निशानियां

फासिल्स की दृष्टि से मंडला को जीवाश्म का मक्का कहा जाता है. यहां डायनासोर के अंडे, उनके शरीर के अंग बहुत बार मिल चुके हैं. जो पत्थर में बदल चुके हैं तो करोड़ों साल पहले यहां लहलहाते समुद्र की गवाही देते हैं, वे पत्थर के शंख जो पाला सुंदर की पहाड़ियों में बिखरे पड़े हैं.

सर्रा पिपरिया में बर्रे में पेड़ पौधों के जीवाश्म बच्चों ने खोज लिए थे. जिसे विदेशी वैज्ञानिकों ने भी परखा तो करीब 12 फुट का यूकेलिप्टस पेड़ का जीवाश्म भी मण्डला में ही मिला इसके अलावा जिले के बहुत से विकास खण्ड में जीवाश्म मौजूद हैं.

कान्हा नेशनल पार्क, टाइगर रिजर्व

मंडला जिले में कान्हा नेशनल पार्क है, जो प्राकृतिक रूप से इसके शौन्दर्य और ऐसे जीव जंतुओं के लिए आदर्श के रूप में जाना जाता है. जो विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुके थे, पूरे विश्व से यहां लोग टाईगर का दीदार करने तो आते ही हैं, वहीं खत्म हो रही बारहसिंगा की प्रजाति भी कान्हा नैशनल पार्क में ही सबसे ज्यादा न केवल संरक्षित हुई, बल्कि आज इनकी संख्या हज़ारों में जा पहुंची है. दूसरी तरफ वे पशु पक्षी भी यहां बड़ी आसानी से दिखाई दे जाते हैं जो दूसरे अन्य पार्कों में अब नहीं दिखाई देते. सूत्रों की मानें तो तेंदुए की संख्या की दृष्टि से भी कान्हा नैशनल पार्क जल्द ही पहले नम्बर पर आ जाएगा. देश के पर्यटन में कान्हा का स्थान और नाम कभी कम नहीं हुआ.

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