हत्या की इंसान की नहीं अपने अंदर की गंदी सोच की कीजिए

बीते दिनों उत्तरप्रदेश के हाथरस में जो कुछ हुआ उससे पूरा देश स्तब्ध है, इस घटना से लोगों का दर्द कम नहीं हुआ था कि फिर बुलंदशहर में हृदय विदारक घटना सामने आई है. ऐसी एक घटना मप्र के खरगोन में घटित हुई. दिनोंदिन अपराधियों के हौसले बुलंद हो रहे हैं. और हम अक्सर ये देखते आएं हैं कि जब भी किसी बहन- बेटियां दुष्कर्म जैसे जघन्य अपराध की शिकार होती हैं तो समाज के लोग ये अपेक्षा करते हैं कि अपराधियों को फांसी या गोली मार दिया जाए. लेकिन क्या दो-चार अपराधियों को फांसी दे देने से इस तरह के अपराध रूक जाएंगे. शायद कभी नहीं.
इसके लिए हत्या इंसान की नहीं, सोच की करने की आवश्यकता है. जो हर गली- मोहल्ले में पल- बढ़ रही है. जिस सोच का ये मानना है कि स्त्री मात्र यौन सुख भोगने का माध्यम है, जो स्त्री को अपने पैर की जूती और उसके साथ की गई जबर्दस्ती को मर्दानगी समझती है. वो सोच जो अपनी नजरों से स्त्री के कपड़े उतार देती है, वो सोच जो सिर्फ स्त्री को भोग करने का साधन समझती है, जो सिर्फ फिजिक्स देखती है, उम्र नहीं. ऐसे इंसान जिनके दिमाग में गंदी मानसिकता के गीड़े हमेशा रेंगते रहते हैं ऐसे कितने लोगों को गोली मरोगे और फांसी पर चढ़ाओगे. यह अपराध और इस तरह की घटनाओं को रोकने का कोई अंतिम उपाय नहीं है.
हर लड़की अपने पूरे जीवन काल में किसी न किसी रूप से शोषण का शिकार होती है. जो ज्यादातर अपने जान- पहचान, नाते- रिश्तेदार, गांव- गली, मोहल्ले और पास पड़ोस में पल-बढ़ रही गंदी सोच के हवस का शिकार बन जाती है.
विडंबना यह भी है कि राजनैतिक दल भी इस तरह के अपराध पर अपनी राजनीति चमके के लिए राजनीति करते हैं. उसका कारण भी है, राजनीतिज्ञों का इस मौके पर एक खास लाभ भी मिलता है और पीड़ित परिवारों को क्या मिलता है, बस संवेदनाएं और कुछ प्रोत्साहन राशि. दुख का विषय यह कि अपराध की बढ़ती सीमा को रोकने के लिए न कोई भी अंतरिम उपाय है न ही इस पर विचार किया जाता है. और एक कहावत आपने सुनी ही होगी कि “चोर- चोर मौसेरे भाई”.
ऐसे में इस तरह के अपराधों को रोकने के लिए हमें अपराधियों को मारने की नहीं बल्कि ऐसी सोच को मारने की जरूरत है. जो आज हमारे आपके बीच में पल बढ़ रही है. इसके लिए हमें और समाज को शख्त होने की जरूरत है.

राजकुमार – विचारक

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