एक थी सिवनी…

एक था सिवनी नगर। जबलपुर और नागपुर के बीच स्थित सिवनी। जिसका नामकरण श्रीवन या बेल के पौधों के नाम पर किया गया था। प्रकृति ने इस शहर को बेपनाह नेमतों से नवाजा था। शहर के बीचों बीच एक कंपनी गार्डन हुआ करता था। इसे शहर का ऑक्सीजन बैंक कहते थे। शहर के आसपास हर ओर वन और पेड़ पौधे थे। शहर में दल सागर सहित आधा दर्जन से अधिक तालाब, दो सैकड़ा से अधिक कुएं थे। शहर का इतिहास भी सैकड़ों वर्षों से जोड़ा जाता था। कहा जाता है कि यहां के मठ मंदिर के शिवलिंग की पूजा आदि शकंराचार्य ने भी की थी। कई खूबियों को अपने मे समेटे एक शहर, नई पुरानी सभ्यता के साथ समन्वय बनाता हुआ। यहां नयापन भी था तो देहातीपना भी।
सिवनी जिले के नामकरण के संबंध में जिले में अनेक दंतकथायें एवं धारणायें प्रचलित है। इतिहास के पृष्ठों में यह जिला मंडला के गौंड राजाओं के 52 गंढों में से एक महत्वपूर्ण स्थल रहा है। नगर मुख्यालय में तीन गढ चावडीए छपारा और आदेगांव प्रमुख थे। गौंड राजाओं के पतन के पश्चात सन 1700 ईण् में नागपुर के भोसले के साम्राज्य के अधीन आ गया। सत्ता का केन्द्र छपारा ही था। सन् 1774 में छपारा से बदलकर मुख्यालय सिवनी हो गया। इसी समय दीवानगढी का निर्माण हुआ और सन् 1853 में मराठों के पतन एवं रघ्घुजी तृतीय की मृत्यु नि:संतान होने के कारण यह क्षेत्र ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रभाव में आ गया। सन् 1857 की क्रान्ति के पश्चात कम्पनी का समस्त शासन ब्रिटिश हुकूमत के अधीन हो गया। मुख्यालय में दीवान साहब का सिवनी ग्रामए मंगलीपेठ एवं भैरोगंज ग्राम मिलकर सिवनी नगर बना। इसके बाद सन् 1867 में सिवनी नगरपालिका का गठन हुआ। सिवनी में वनोपज हर्राए बहेडाए आंवला एवं महुआ बहुतायात में होता है। महुआ का अधिक उत्पादन होने के कारण सन् 1902 में डिस्लरी का निर्माण हुआ। सन् 1909 तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर श्लोकाक विस्तार करते हुए रेल्वे लाईन का विचार किया। सन् 1904 में बंगाल नागपुर नैरोगेज रेल्वे का आगमन हुआ। सन् 1938 में बिजली घर के निर्माण ने नगर में एक नये युग का सूत्रपात किया। नगर की गलियां और घर बिजली की रोशनी से जगमगा उठे।
सन् 1939 से 1945 के मध्य द्वितीय विश्व युद्व ने अंग्रेजी साम्राज्य की जडे हिला दी।
नागपुर से जबलपुर एनण्एचण् 7 के मध्य सिवनी ना केवल प्रमुख व्यापारिक केन्द्र था बल्कि जंगल अधिक होने के कारण अंग्रेजों के लिए सुरक्षित स्थान भी था। महात्मा गांधी के अथक प्रयासों और स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के अमर बलिदान से 15 अगस्त 1947 को हमारा देश स्वतंत्र हुआ।
सिवनी जिला सन् 1956 में पुन: जिला बना। जिला बनने पर प्रथम कलेक्टर श्री एण्एसण् खान पदस्थ हुए। हमारा अतीत गौरवशाली रहा हैए वर्तमान में अनेक उतार चढाव देखने के पश्चात भी इस जिले में अपनी विकास यात्रा जारी रखी है। जिले में अनेक सपूतों ने अपनी यशगाथा प्रदेशए देश और विदेश में फैलाई है। उनमें परम पूज्य द्विपीठाधीश्वर जगत गुरू शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी महाराज का नाम प्रमुख है।
खैर २१वीं सदी तक सब कुछ सामान्य सा चलता रहा लेकिन न जाने किसकी नजर लग गई इस शहर को। शहर में रुकरुककर भूंकप के से झटके आने लगे। कभी कम तो कभी अधिक तीव्रता के। चाहे जब आने वाले इन झटकों से लोगों का परेशान होना घबराना स्वाभाविक था। लोगों ने प्रशासन, शासन से बात की लेकिन शहर और जिले के जनप्रतिनिधि और जिम्मेदार कानों में रुई डाले बैठे रहे। गांधी के तीन बंदरों की तरह न कुछ देखेगे न बोलेंगे न सुनेंगे। किसी ने न तो इन झटकों की वजह जाने की कोशिश की ना ही इन्हें रोकने की। कहा जाता है कि शहर को धन के लालच में खोखला कर दिया गया था। और एक दिन वही हुआ जिसका डर था। उस रात पूरा शहर चैन की नींद सो रहा था लेकिन अचानक आए तीव्र झटकों ने एक पल में ही सब कुछ नेस्तानबूद कर दिया। जिस तरह छपारा शहर को पिंडारियों ने एक ही रात में तहस नहस कर दिया था उसी तरह छपारा के बाद महत्व पाने वाले शहर सिवनी का अंजाम हुआ। आज सिवनी इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए दब चुका है। …

(भविष्य में इस तरह का लेख, पाठ किसी किताब, पाठ्यपुस्तक, इंटरनेट आदि में न छपे इसके लिए जागिए सरकार… जागिए मित्रो। कुछ कीजिए क्योंकि वक्त अपनी रफ्तार से चल रहा है और हर पल लिख रहा है एक नया इतिहास। कहीं देर न हो जाए। )

मनीष तिवारी (स्वतंत्र विचारक एवं लेखक)

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं

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