दुर्लभ “काल भैरव” मंदिर एवं “श्यामलता”

आदेगांव लखनादौन में स्थित है यह दुर्लभ मंदिर

लखनादौन से १७ कि.मी. दूर ग्राम पंचायत आदेगांव स्थित है। इस कसबे ने भी अपने आप को सादगी से सजाया हुआ है। पहले आपको उसके इतिहास से अवगत करता हूँ। खड्कू भारती गोसाई द्वारा “आद्य नगर भैरवगंज” का नाम परिवर्तित कर आदेगांव रखा गया। नाम परिवर्तन का कारण नाम का लम्बा होना था। आदेगांव में मालगुजारी के दौरान भव्य दरवाजे का निर्माण कराया गया था। जिसे उखाड़ कर ३० कि.मी. दूर हर्रई(अमरवाडा के पास) में पुनः स्थापित कर दिया गया। यहाँ का “श्रृंगार मोहनी” का मंदिर भी इतिहास में वर्णित है। भारती गोसाई के अधिपत्य में लगभग ८४ गाँव की मालगुजारी होती थी। वर्तमान में लगभग १०० गाँव का लेनदेन आदेगांव से किया जाता है। सिवनी जिले से, आदेगांव का नाम सोने के व्यापार में प्रमुख है। आदेगांव एक बाज़ार के रूप में उभर कर सामने आया है।

आदेगांव का किला या गढ़ी

जानकारी के अनुसार सन १८०० के आस-पास नागपुर के शासक रघुजी भौसलें के गुरु नर्मदा भारती(खड्कू भारती गोसाई) ने आयताकार पूर्वाभिमुखी किले की नीव रखी। उस समय किले का अधिपत्य गुरु नर्मदा भारती के पास ही था। जिन्होंने किले के अन्दर “काल भैरव” के मंदिर का निर्माण कराया। जिसमे भगवान काल भैरव, बटुक भैरव तथा नाग भैरव की मूर्ति स्थापित की गई। आदेगांव के अलावा सिर्फ काशी में ही भगवान काल भैरव के दर्शन किये जा सकते हैं। आदेगांव में विराजमान “काल भैरव” की मूर्ति काशी में विराजित मूर्ति से भी बड़ी है। वर्तमान में किले की ऊँची चहार दिवारी(परकोटा) एवं बुर्ज ही शेष है।

यहाँ है दुर्लभ वृक्ष

आदेगांव में पानी के मुख्यतः दो श्रोत हैं। इसमें से बड़ा तलाव किले से काफी दूर है। जिसका उपयोग मालगुजारी के समय से होता आ रहा है। और छोटा तलाव किले के पीछे मौजूद है। आदेगांव में गर्मी के मौसम में पानी की समस्या विराट रूप ले लेती है। वन अधिकारियों के अनुसार आदेगांव में पुष्पलता नाम का वृक्ष मौजूद है। वर्तमान समय में इस वृक्ष को श्यामलता के वृक्ष के नाम से जाना जाता है जो भारत के किसी भी कोने से उपलब्ध नहीं हो पाया।

सिवनी के आदेगांव में उत्साह से मनाया जाता है कालभैरव का जन्मोत्सव

भगवान कालभैरव अष्टमी उत्साह से सिवनी जिले में मनाई जाती हैं। आदेगांव के प्रसिद्ध काल भैरव मंदिर में नगर कोतवाल का जन्मोत्सव श्रद्धा के साथ मनाया जाता हैं। आदेगांव में भैरव अष्टमी व जन्मोत्सव से जुड़े कार्यक्रम होते हैं। प्राचीन गढ़ी मंदिर को आकर्षक विद्युत सज्जा से सजाया जाता है। ढोल, बाजे-गाजे व आतिशबाजी के साथ रात 12 बजे भगवान श्री कालभैरव का जन्मोत्सव मनाया जाता है । प्राचीन गढी में विराजमान भगवान श्री कालभैरव नाथ स्वामी, भगवान श्री गणेश, बटुकभैरव, दूधिया भैरवनाथ, शेषनाग महाराज व भगवान शिव परिवार का सुबह अभिषेक पूजन किया जाता है । जलाभिषेक, दुग्धाभिषेक, पंचामृत अभिषेक के बाद सभी प्रतिमाओं का आकर्षक श्रृंगार कर अल सुबह पूजन आरती की जाती है । हवन पूजन के साथ श्रद्धालुओं के भगवान कालभैरव के दर्शन करने पहुंचने का सिलसिला देर रात तक जारी रहता हैं

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