टीकाकरण -“भय के आगे जय है ,विजय है : नरेश शर्मा

हम भारतवासी विश्व की संपूर्ण भूमि के सातवें सबसे बड़े क्षेत्रफल पर निवासरत है । विश्व के दूसरे अनुक्रम की सर्वाधिक जनसंख्या है हमारी । हमें विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के निवासी होने का गौरव प्राप्त है । हमारी जनसंख्या बढ़ने का सुखद कारण यह है कि देश की “मृत्यु दर” कम है जबकि “जन्म दर” अधिक है ।आदर्श स्थिति यह है कि दोनों ही कम हों ।जागरूकता के कारण विगत वर्षों में आबादी बढ़ने की दर में किंचित कमी हुई है । संयुक्त राष्ट्र वर्ल्डोमीटर के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार भारत की जनसंख्या 138 करोड़ है । यह जनसंख्या विश्व की जनसंख्या का लगभग 18% है । नई रणनीति के अनुसार तब जबकि फ्रंट वॉरियर्स , गंभीर रोग से पीड़ित , 60 वर्ष की आयु से अधिक , 45 वर्ष की आयु से अधिक आयु समूह के नागरिकों का टीकाकरण प्रगति पर है ,18 वर्ष की आयु के अधिक सभी नागरिकों को टीकाकरण हेतु पात्र घोषित किया गया है । यह महानतम एवम पवित्र कार्य 1 मई 2021 से प्रारंभ किया जाना सुनिश्चित किया गया है । इस रणनीति के साथ टीकाकरण योग्य जनसंख्या का आकार लगभग 84 करोड़ हो गया है । इंडिया रेटिंग एंड रिसर्च ( Ind-Ra )के अनुसार इस वर्ग के सभी भारतीयों को टीका लगाने की अनुमानित लागत 67.139 करोड़ रुपए होगी ,यह देश की जीडीपी का 0.36% है । केंद्र सरकार ने कोवाक्सिन-भारत बायोटेक से और कोविशिल्ड- सिरम इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया से खरीदी है ।दोनों ही टीके सुरक्षित एवम जीवनोपयोगी हैं । टीकाकरण में खर्च की जाने वाली राशि का बंटवारा केंद्र और राज्य सरकारों के बीच जीडीपी का 1 अनुपात 2 है । अर्थात केंद्र अपनी जीडीपी का जितना प्रतिशत राज्य टीकाकरण हेतु सहयोग करेगा , उसका दुगना सम्बंधित राज्य सरकार के द्वारा वहन किया जाएगा । प्रवासी मजदूरों के कारण उनके प्रमुख गंतव्य राज्य – महाराष्ट्र,पंजाब,दिल्ली,कर्नाटक,गुजरात की सरकारों कोअपेक्षाकृत अधिक राशि वहन करनी होगी । इन राज्यों को जीडीपी के संतुलन हेतु प्रवासी मजदूरों का पलायन रोकना ही होगा। इस हेतु सरकारों को इन मजदूरों को चिन्हित कर उनके पहचान पत्र बनवा कर उन्हें “कम से कम राशन” के प्रति तो आश्वस्त करना ही होगा उन्हें उन्हीं स्थानों पर टीकाकरण कराने का न केवल विश्वास दिलाना होगा अपितु उनके टीकाकरण की पृथक से व्यवस्था भी करनी होगी। पिछले संकटकाल में विश्व के गरीब हुए 100 लोगों में से 60 भारत के थे जिसका एक कारण भारी मात्रा में पलायन करने वाले प्रवासी मजदूर भी थे । बैंक गरीबों या प्रवासी मजदूरो को ऋण देने हेतु उत्सुक प्रतीत नहीं हो रहे हैं अतः”आत्मनिर्भर भारत “की योजना दम तोड़ती नजर आ रही है । कोरोना ने जैसे महाराष्ट्र को अपना मुख्यालय घोषित कर दिया है । महाराष्ट्र के कोरोना आंकड़े पूरे देश पर भारी पड़ रहे हैं आखिर वह महा-राष्ट्र जो ठहरा । यही हालात कमोबेश गुजरात “सौ-राष्ट्र” छत्तीस-गढ़ की है । जो अपने नामों के अनुकूल ही है । इन राज्यों की संक्रमित जनसंख्या कई राष्ट्रों की कुल जनसंख्या से भी अधिक है । विश्व में 100 से अधिक देशों की जनसंख्या 3 करोड़ से भी कम है ।आईएसओ मानक 3166-1 के अनुसार विश्व के कुल 223 देश हैं । जिनमें प्रभुता संपन्न राष्ट्र और बसे हुए अधीन क्षेत्र सम्मिलित है । वर्तमान में मुंबई की जनसंख्या लगभग 1.84 करोड़ , दिल्ली 1.63 करोड़ , कोलकाता 1.41 करोड़ एवम बेंगलुरु की जनसंख्या 50 लाख से अधिक है । अकेले महाराष्ट्र की जनसंख्या 12 करोड़ 50 लाख के लगभग है ।ऐसे में देश के 84 -85 करोड़ नागरिकों का टीकाकरण एक निर्णायक घड़ी है एवम यह एक विशालतम आयोजन है । यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि इस बृहद टीकाकरण का लाभ इस लहर की चरम स्तिथी ( पीक ) में प्राप्त नही होगा । शासन को ध्यान रखना होगा कि टीकाकरण की यह योजना सम्भावित उमड़ने वाली भीड़ के कारण ” सुपर स्प्रेडर इवेंट ” न बन जाये । विभिन्न धर्मों की हमारी “गंगा-जमुनी संस्कृति” अनेकों जाति ,वर्ग , समुदाय की”सतरंगी” जीवन शैली के फलीभूत हम प्रतिमाह कोई ना कोई बड़ा त्यौहार, महापुरुष की जयंती ,मेला आदि उत्सव / आयोजन में “आनंद विभोर”रहते हैं । विगत 13-14 माह के कोविड-19 के दुष्प्रभावों का सामना करते हमारी अर्थव्यवस्था “रसातल” को हो चली है । हमारे जीवन पर गहरे घाव लगे , अपनी जीवनशैली के चलते इस संकट काल मे भी उत्तराखंड की पवित्र नगरी हरिद्वार में महाकुंभ का आयोजन कर हमने धर्म पताका लहराया यह महोत्सव हमारी सनातन संस्कृति का प्रतीक है । पुण्य सलिला जीवन दायिनी , हमारी जीवन रेखा , पवित्र नदी माँ गंगा के तट पर महाकुम्भ के पारम्परिक शाही स्नान आयोजित हुये । हमने इस मेले में 20 लाख लोगों का एक ही दिन में विशालतम एकत्रीकरण करवाकर शाही स्नान कर धर्म परायणता का उदाहरण प्रस्तुत किया है । अज्ञानता वश इस महाकुम्भ के आयोजकों एवम श्रद्धालुओं ने सम्मिलित होकर अति उत्साह एवम धर्मांधता के कारण कोविड-19 अनुसार आचरण का अनुसरण न कर संक्रमण के प्रसार में महती भूमिका का निर्वाह किया है । हमारे अदूरदर्शिता रखने वाले राजनैतिक कर्णधारों ने पांच राज्यों में ” किला बचाओ / किला बनाओ हेतु विधानसभा चुनाव, उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव , तथा मध्य प्रदेश की दमोह विधानसभा पर उपचुनाव में रैलियों , रोड-शो , जनसमूह एकत्रित कर जनसभाओं और आम सभाओं का आयोजन कर मिथ्या दम्भ प्रदर्शित करते हुये भीड़ देखकर इतराते हुए अट्टहास किया। हमारे अयोग्य प्रशासकों ने कर्णधारों को बंद कमरों में चापलूसी करते हुये संक्रमण की प्रथम लहर पर विजय का मिथ्या विश्वास दिलाया । उनके नेत्रों पर वैक्सीन विक्ट्री एवम कोविड डिफिट का चश्मा लगाकर भृमित कर दिया , जिससे हमारे कर्ता धर्ता आत्मविभोर होकर स्व-प्रशंसा के सागर में गोते लगाते हुये हमे ले डूबे । केंद्र सरकार व विपक्ष के नेताओं ने पश्चिम बंगाल में चुनाव जीतने के जुनून में वहाँ डेरा डालकर जनता को “काल के गाल” में झोंकने में कसर नही छोड़ी । चुनावी शोर के कारण उनके कानों तक टीकाकरण हेतु टीकों की कमी,लगातार भारी संख्या में संक्रमित होते बीमारों के लिए अस्पतालों ,अस्पतालों के बेड,आवश्यक जीवन रक्षक दवाओं,प्राणवायु -ऑक्सीजन वेंटीलेटर की कमी की ध्वनि , डैम तोड़ते लोगों व उनके परिवारजनों की चीखें नही पहुँच पाई । देश विदेश के समाचार पत्रों व मीडिया में जब निंदा तीखी व तीव्र हुई तो प्रशासकों ने शासन के “कान फूंके ” जब तक जूँ रेंगती तब तक काफी देर हो चुकी थी । स्वांग रचाते हमारे नेता “भैंस के पानी में जाने के बाद ” सांकेतिक कुंभ आयोजन की मंत्रणा धर्म गुरुओं से करने लगे अर्थात यहाँ भी वे धर्म के काँधे पर बंदूक रखने से बाज़ नही आये । आधे से अधिक चुनाव समाप्त हो जाने के बाद पश्चिम बंगाल की रैलियाँ , रोड शो रद्द करने का मिथ्या प्रदर्शन कर स्वतः को अति संवेदनशीन प्रदतशित करने लगे । एक वर्ष का समय मिलने के उपरांत भी केंद्र व राज्य सरकारों ने कोरोना की संभावित दूसरी लहर को अनदेखा कर अज्ञानी की भाँति इतराकर घोर दायित्व हीनता व उदासीनता का परिचय दिया , जिसकी परिणति हम सबके समक्ष हैं । अभी तो कुम्भ स्नान व चुनावों के उपरांत लोगों का देश के विभिन्न स्थानों पर अपने घरों को पहुँचने उपरान्त के संक्रमित आँकड़े प्राप्त होना प्रतीक्षित है । कोलकोता में तो प्रति दूसरा व्यक्ति संक्रमित पाया जा रहा है ।चुनाव उपरान्त शासन के इस आचरण से क्षुब्ध होकर माननीय उच्च न्यायालय दिल्ली , मुंबई , मद्रास ,जबलपुर एवम सर्वोच्च न्यायालय को कठोर टिप्पणी हेतु विवश होकर सत्तासीनों को आड़े हाथों लेना पड़ा । उच्च न्यायालय मद्रास ने तो चुनाव आयोग का कृत्य हत्या का प्रकरण पंजीकृत करने योग्य होना कहकर अत्यंत कठोर टिप्पणी की है । अब चुनाव आयोग ने मतगणना उपरान्त विजयी जुलूस प्रतिबंधित कर महान कार्य कर देना प्रदर्शित किया है जबकि इस सम्पूर्ण घटना चक्र में चुनाव आयोग की भूमिका व कृत्यों से हम भलीभाँति अवगत हैं । माननीय उच्च न्यायालय दिल्ली ने वहाँ की स्थानीय सरकार के अधिकार केंद्र सरकार को हस्तान्तरित कर देने तक की चेतावनी दी । माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को भी कठोरता से प्रश्नांकित किया है । विडंबना है कि है कि प्रशासन का कार्य न्यायालयों को करना पड़ रहा है । हमारी स्वास्थ्य सेवाएं वर्तमान में प्रश्न अंकित हो गई है । स्वास्थ सुविधाओं का आंकलन यह विचारण करने हेतु विवश कर रहा है कि हमारे इतने बड़े गणराज्य की श्रेणी क्या है ? विकसित , विकासशील का अविकसित ! वर्तमान स्वास्थ व्यवस्थओं में इस महामारी से “अभिजात्य भारत” तो येन-केन प्रकारेण उपचार पा लेगा किन्तु दैनिक “रोटी के लिये संघषर्रत भारत ” का क्या होगा ? हम स्वतंत्रता की हीरक वर्षगांठ के करीब है किंतु अपने धर्मांधता , पिच्छलग्गुपन,बतोलेबाजों व जुमलेबाजों के पीछे भेड़ों की भाँति चलने की प्रवृत्ति के कारण अपने ऊपर लगे “सपेरों के देश” का टैग हटाने में सफल नहीं हो पा रहे हैं ।अब हमारे समक्ष अस्तित्व बचाने का ही संकट प्रगट हो गया है । हमारे समक्ष आगामी संभावित ही नहीं अपितु संक्रमण की सुनिश्चित तीसरी लहर है । उसके पूर्व कम से कम 90 करोड़ भारतीयों का टीकाकरण करके “हर्ड इम्युनिटी” निर्मित करना अवश्यंभावी हो गया है । टीकाकरण से चुके तो यह बात मंत्र की तरह जीवन में उतार लेना चाहिए कि “हमारे दुख का कारण हम स्वयं है”। सकारात्मक व सुखद तथ्य यह है कि हमारी स्वास्थ्य सेवाएं विश्व मानकों के प्रथम श्रेणी की है , कहीं कहीं ये उससे भी ऊपर की है । हमें अपने दोनों टीकों को-वैक्सीन एवम कोविशिल्ड व् पर पूर्णतः विश्वास करना चाहिये निसंदेह ये जीवनदायी एवम पूर्णतः सुरक्षित हैं । इनके लगने के उपरांत भी सामाजिक दूरी, हाथों की सफाई , मास्क लगाने के आचरण का पालन करना ही होगा । “दवाई भी और कड़ाइ भी”मन्त्र भी कंठस्थ कर लिया जाना चाहिये । यह सही है कि डार्विन की थ्योरी “योग्यतम की उत्तरजीविता ( Survival of fittest )” के अनुकूल कोविड-19 वायरस मे डबल म्यूटेशन ही नही अपितु ट्रिपल म्यूटेशन भी हो गया हैh ।इस जटिल “जिनोम सीक्वेंसिंग ” का अध्ययन हमारा विषय नहीं है। हमें तो केवल यह समझ लेना है कि टीकाकरण नितान्त आवश्यक हो गया है । अव्वल तो टीकाकरण के उपरान्त संक्रमित होने की संभावना न्यून है किन्तु यदि कोई संक्रमित होता भी है तो वह गंभीर बीमार नहीं होगा , उसे अस्पताल जाने की कम ही आवश्यकता होगी व उसका जीवन संक्रमण से संकटापन्न नही होगा । पुलिस सेवा के प्रारंभिक वर्षों में मुझे इंदौर , खरगोन , जबलपुर ,कटनी ,मंडला बालाघाट के विभिन्न थानों में उपनिरीक्षक थाना प्रभारी एवम निरीक्षक थाना प्रभारी के रूप में कार्य करने का अवसर प्राप्त हुआ है । हमने ग्राम भ्रमण के दौरान सदैव ग्रामीणों को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहने हेतु प्रोत्साहित किया है । यहां तक मंडला एवम जबलपुर जिले में हमने बंद हैंडपंप और उनकी निकलने वाले अशुद्ध जल (फ्लोराइड वाटर ) के उपयोग से न केवल ग्रामीणों को सचेत कर व्यवस्थायें सुनिश्चित कराई है अपितु संबंधित कलेक्टर को इसकी शिकायत कर उचित निदान भी करायें है तात्पर्य है कि पुलिस को अपनी बेसिक पुलिसिंग पर वापस आकर टीकाकरण हेतु थाना क्षेत्रवासियों को प्रोत्साहित कर इस “महायज्ञ में अपनी ओर से आहुति” देकर सकारात्मक भूमिका निभाना चाहिये । यद्यपि भारत एक सॉफ्ट स्टेट ( उदार राष्ट्र ) है तथापि जनहित में टीकारण बाध्य करने हेतु कठोर वैधानिक निर्णय लिये जाना भी उचित होगा । नागरिकों को यह समझाना ही होगा कि टीका हमारे लिए संजीवनी के समान है । हमे हमारे आराध्य श्री राम भक्त हनुमान जी महाराज से प्रेरणा लेकर स्वयम को सुरक्षित रखकर इस महामारी रूपी रावण की लंका का दहन करना ही होगा ।कोविड के विरुद्ध जंग लम्बी चलेगी ।

चूंकि ” डर के आगे जीत है ” , अतः भयमुक्त होकर टीकाकरण करायें एवं कोविड-19 के विरुद्ध युद्ध में अपनी विजयश्री सुनिश्चित करें.

नरेश शर्मा , राज्य पुलिस सेवा

सेवा निवृत्त नगर पुलिस अधीक्षक जबलपुर ( म.प्र.)

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