पर्यावरण के दोहे …

बिगड़ा है पर्यावरण,बढ़ता जाता ताप !
ज़हरीली सारी हवा,कैसा यह अभिशाप !!

द्रव ईंधन व्यापक जले,बिजली जलती ख़ूब !
हरियाली नित रो रही,सूख गई सब दूब !! 

यंत्रों ने दूषित किया,मौसम और समाज !
हमने की है मूर्खता,हम ही भुगतें आज !!

नगर घिर गये धुंध में,धूमिल सारे गांव !
धुंआ-धुंआ जीवन हुआ,गायब सारी छांव !!

दिखती ना पगडंडियां,चारों ओर गुबार !
तिमिर विहँसता नित्य ही,रोता है उजियार !!

जनजीवन रोने लगा,सिसक रहा इनसान !
हर प्राणी भयभीत है,आफत में है जान !!

आवाजाही रुक गई,मंद हुआ व्यापार !
शिक्षा,ऑफिस,काम पर,हुई सघनतम् मार !!

प्रकृति बिलखती आज तो,कारण है अविवेक !
यदि हम चाहें निज भला,तो करनी हो नेक !!

आत्मचेतना से मिटे,प्रियवर आज कलंक !
सभी करें कुछ अब खरा,क्या राजा ,क्या रंक !!

फिर से अब आबाद हों,सभी बस्तियां-गांव !
तभी मिलेगी वक़्त को,मनभावन इक छांव !!

प्रो.(डॉ.)शरद नारायण खरे
प्राध्यापक इतिहास/प्राचार्य
शासकीय जेएमसी महिला महाविद्यालय
मंडला(मप्र)-481661

प्रमाणित किया जाता है कि प्रस्तुत रचना व अप्रकाशित है -प्रो शरद नारायण खरे

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