अब स्वास्थ्य क्रांति अवश्यंभावी : नरेश शर्मा

सौभाग्यवश हम ऐसे राष्ट्र के निवासी हैं जिसकी विश्व मे अनेकानेक तपस्वियों की कर्म भूमि,पवित्र धर्म स्थली एवम आध्यात्मिक तपोभूमि के रूप में में पहचान स्थापित है । कुतर्क यह भी है कि हमारी अति श्रद्धा , अन्धविश्वास, हमारा मेलों-ठेलों,उत्सवों के प्रति आकर्षण,त्योहारों को मनाने की उन्मादकता के कारण हमारे महान देश को ” सपेरों का देश ” की संज्ञा व विशेषण से भी विभूषित किया गया है । यही समय है कि अब हम सभी चेत जायें ,धार्मिक आस्था एवम ईश्वर में विश्वास के साथ-साथ अपनी अवैज्ञानिक विचारधारा को त्याग वैज्ञानिक सोच की ओर आकर्षित एवम अग्रेषित होकर परिपक्वता का परिचय दें । हमारे देश में स्वास्थ्य को नकारात्मक अर्थ में परिभाषित किया गया अर्थात “रोगों की अनुपस्थिति”को ही स्वास्थ्य माना गया है ।जबकि वास्तविक एवम प्रमाणित यह है कि- ” आरोग्यम परमं भार , स्वास्थ्यम सर्वार्थ साधनम । ” भावार्थ यह है कि स्वस्थ जीवन ही राष्ट्र की सफलता की कुंजी है । नागरिक का स्वास्थ्य उसके देश के विकास का सूचकांक है । भारत के लोग बीमारी को लेकर उतना सजग नहीं है जितने बीमार हो जाने के उपरांत बीमारी के उपचार करने हेतु खर्च करने में।रोगी के उपचार के साथ-साथ रोगों की रोकथाम पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है । विश्व स्वास्थ्य संगठन ( डब्ल्यू.एच.ओ) ने 1948 में स्वास्थ्य या आरोग्य को इस प्रकार परिभाषित किया है :- 1- दैहिक , मानसिक एवं सामाजिक रूप से पूर्णतः समस्या विहीन होना ही स्वास्थ्य है । 2-किसी व्यक्ति के मानसिक , शारीरिक और सामाजिक रुप से अच्छे होने की स्थिति को ही स्वास्थ्य कहते हैं । सार्वभौमिक दृष्टिकोण से यह कहा जा सकता है कि जो अपने जीवन में आने वाली शारीरिक,भावनात्मक एवं सामाजिक चुनौतियों का सफलतापूर्वक प्रबंधन करने में सक्षम है वह व्यक्ति स्वस्थ है । रोग की अनुपस्थिति एक वाँछनीय स्थिति है किंतु यह पूर्णता स्वास्थ्य को परिभाषित नहीं करती वस्तुतः अच्छे स्वास्थ्य की कल्पना “समग्र स्वास्थ्य”का पर्याय है । जिसमें शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक ,आध्यात्मिक एवं सामाजिक स्वास्थ्य सम्मिलित है। “समग्र स्वास्थ्य” से परिपूरित व्यक्ति ही “स्वस्थ दृष्टिकोण का धारक” हो सकता है । मनुष्य स्वास्थ्य की ओर तब तक ध्यान नहीं देता जब तक कि वह अस्वस्थ नहीं हो जाता । स्वास्थ्य के पूर्व उसकी प्राथमिकता रहती है – संपत्ति,सम्मान,शक्ति ,ज्ञान , सुरक्षा आदि ।यह न केवल व्यक्ति का उत्तरदायित्व है कि वह अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखें अपितु प्रत्येक राष्ट्र का कर्तव्य होता है कि वह अपने प्रत्येक नागरिक को उत्तम स्वास्थ्य प्रदान करें । मनुष्य में पूर्णरूपेण स्वस्थ रहने की लालसा होना नितांत स्वाभाविक है एवं सर्वभौमिक भी है । उत्तम स्वास्थ्य अपने आप में एक लक्ष्य है,जिसे प्रत्येक व्यक्ति पाने का हर संभव प्रयास करता है जो कदापि अनुचित नहीं है अपितु उत्तम, सफल एवं संतोषप्रद जीवन हेतु नितांत आवश्यक है । पिछले कुछ दशकों से निरंतर चले आ रहे इस मानवीय रूख को दृष्टिगत रखते “स्वास्थ्य को मौलिकअधिकार” माना गया है । सन 1977 में तीसरी विश्व स्वास्थ्य सभा में विश्व स्वास्थ्य हेतु सन 2000 तक “सभी के लिए स्वास्थ्य ” का नारा दिया गया था । एक देश का स्वास्थ्य,परंपरागत रूप से उस देश की “मृत्यु दर” के द्वारा आँका जाता है। सौभाग्यवश हमारे देश की “मृत्यु दर”,”जन्म दर” से बहुत कम है । जबकि आदर्श स्थिति यह है कि दोनों ही कम होनी चाहिये ।जन्म दर का अधिक व मृत्यु दर का उपरोक्तानुसार कम होना देश की जनसंख्या में वृद्धि का एक प्रमुख कारण है । निरंतर बढ़ती हुई जनसंख्या ने भी मनुष्य के स्वास्थ्य को प्रतिकूल रूप से प्रभावित किया है । स्वास्थ्य के सम्बन्ध में स्वामी विवेकानंद जी ने कहा है कि – “एक कमजोर व्यक्ति,जिसका शरीर या मन कमजोर है वह कभी भी सशक्त काया का स्वामी नहीं बन सकता।” समय-समय पर स्वास्थ्य को अनेक रूप से परिभाषित किया गया है ।अब स्वास्थ्य में परिभाषा के अतिरिक्त अन्य कई नये निम्न आयाम जोड़े जा रहे है :-

1– स्वास्थ्य मनुष्य का मौलिक अधिकार है । 2- स्वास्थ्य उत्पादन क्षमता का प्रतिबंध है ना कि चिकित्सा पर किया गया खर्च 3- स्वास्थ्य विकास का एक अभिन्न अंग है 4- स्वास्थ्य रक्षा व्यक्तिगत राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी है । 5- स्वास्थ्य रक्षा एक मुख्य सामाजिक कर्तव्य है । — निरन्तर औद्योगीकरण,निर्माण एवं अन्य विकास कार्यों के चलते जहाँ एक ओर वातावरण में प्रदूषण बढ़ रहा है वहीं दूसरी और वैध-अवैध कटाई से उत्तपन्न वृक्षों की भारी कमी , जंगलों का घटता क्षेत्रफल न केवल पर्यावरण को प्रभावित कर रहा है अपितु निरन्तर अनेकानेक प्राकृतिक आपदाओं के आमंत्रण का कारण भी बन गया है । मौसम में, ऋतु में,जलवायु में, निरंतर हो रहे परिवर्तन के दुष्परिणाम स्वरूप ग्लोबल वार्मिंग, अतिवृष्टि, समुद्री तूफान ,भूस्खलन ,भूकंप, ज्वालामुखी विस्फोट आदि समस्याओं से विश्व को सामना करना पड़ा रहा है । इन प्राकृतिक आपदाओं से मनुष्य के स्वास्थ , कृषि एवम वातावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है । हमारे राष्ट्र में कृषि की समस्या से निपटने के लिए 1966-67 में वृहद रूप से “हरित क्रांति” को प्रारम्भ करने का श्रेय नोबेल पुरस्कार विजेता प्रोफेसर नॉर्मन बोरलॉग को जाता है किंतु भारत में एम.एस.स्वामीनाथन को इसका जनक तथा भारत के तत्कालीन कृषि एवं स्वास्थ्य मंत्री स्वर्गीय बाबू जगजीवन राम जी को “हरित क्रांति”का प्रणेता माना जाता है । “हरित क्रांति”के सफलतम संचालन की अत्यंत संतोषप्रद एवं सुखद परिणिती परीलक्षित हुई हैं परिणामतःआज हमारा कृषक अधिक उपज करने एवं रासायनिक उर्वरकों का कुशलता से प्रयोग करने में सिद्धहस्त हो गया है । कृषि में उन्नतशील बीजों की उपलब्धता सुगम हुई है तथा सिंचाई,पौधा संरक्षण,बहुफसली भूमि , आधुनिक कृषि यंत्रों के प्रयोग की प्रचुरता से कृषक लाभान्वित हुए हैं जिससे राष्ट्र में खाद्यान्न की समस्या का यथोचित निवारण हुआ है।कृषि उद्योग निगम,कृषि सेवा केंद्र,विभिन्न निगमों की स्थापना,मृदा परीक्षण,भूमि संरक्षण आदि संस्थाओं ने प्रत्येक कृषक के हित में कार्य कर उन्हें आर्थिक रूप से सम्बल किया है । कृषि शिक्षा में अनुसंधान कार्यक्रमों द्वारा उत्पादन एवं उत्पादकता में वृद्धि हुई है एवं कृषि के पारंपरिक स्वरूप में परिवर्तन के साथ साथ “कृषि बचतों” में वृद्धि हुई है। यद्यपि हरित क्रांति अपने आप में पूर्ण नहीं है इसमें क्रियान्वयन में निरंतर सुधार की गुंजाइश हैं । रबी की फसल,खरीफ की फसल के अतिरिक्त जायद की फसल – ( मुख्यतः मार्च-अप्रैल में बोई जाने वाली फसलें उदाहरणार्थ तरबूज,ककड़ी,खीरा आदि ) में आशानुकूल सुधार परिलक्षित हुआ है । कृषि व उससे जुड़े अन्य क्षेत्रों को उन्नत बनाने की दृष्टि से “श्वेत क्रांति” के साथ-साथ 28 जुलाई 2020 को नई राष्ट्रीय कृषि नीति का प्रारंभ किया गया इसका वर्णन ‘इंद्रधनुषी क्रांति” के रूप में किया गया । इस कृषि नीति में देश के कृषि क्षेत्र से प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से संबंधित विभिन्न क्रांतियां जैसे श्वेत क्रांति ( दुग्ध उत्पादन ),पीली क्रांति (तिलहन उत्पादन ),नीली क्रांति (मत्स्य उत्पादन ),लाल क्रांति ( मांस रक्षण एवं टमाटर उत्पादन ), सुनहरी क्रांति (सेव उत्पादन ), भूरी क्रांति (उर्वरक उत्पादन ), ब्राउन क्रांति ( गैर परंपरागत ऊर्जा स्त्रोत वृद्धि ), रजत क्रांति (अंडे एवं मुर्गी पालन वृद्धि ), खाद्यान्न शृंखला क्रांति ( खाद्यान्न , फलों फल और सब्जी को तोड़ने से बचाना ) आदि को साथ लेकर चलना होगा । इन सभी कृषि एवम कृषि सहायक नीतियों को संयुक्त रूप से”इंद्रधनुषी क्रांति” की संज्ञा दी गई । निःसन्देह इस कृषि नीति से किसान एवं संबंधित व्यवसाय करने वाले लाभान्वित हुये हैं । यद्यपि वास्तविक कृषक ( छोटा किसान ) आज भी अभाव का जीवन यापन करने हेतु विवश है । पर्याप्त कृषि साधन एवं अर्थ के अभाव में उसकी नजरें आसमान की ओर वर्षा हेतु टकटकी लगाये रहती हैं। अतिवृष्टि, ओस-पाला, तुषार ,ओलावृष्टि ,सूखा व कीटों- टिड्डों , इल्ली-भुनगों आदि से वह अपनी फसल की पर्याप्त रक्षा नहीं कर पाता है। जबकि उन्नत किसान ( मझौले एवम बड़े ) अपेक्षाकृत अधिक संतुष्ट एवं संपन्न हो चुके हैं । ” इंद्रधनुषी क्रांति” की यथोचित सफलता के प्रेरित होकर अब उसी के अनुरूप वर्तमान परिवेष में “स्वास्थ्य क्रांति” जैसी मानव रक्षक नीति अपरिहार्य प्रतीत हो रही है। चूंकि हमारी 68% के लगभग आबादी ग्रामीण है अतः इसका “श्री गणेश ” कृषि नीति के अनुरूप ग्रामीण अंचल से ही किया जाना सुनिश्चित होना वाँछनीय है । ज्ञात है कि वर्तमान में संपूर्ण विश्व कोविड-19 नामक विषाणु एवं उसके निरंतर परिवर्तित ( म्यूटेशन ) होते हुए आकार , प्रकार (वेरिएंट्स )से ग्रसित है । इस वायरस की “जिनोम सीक्वेंसिंग”के अध्ययन से विदित हो चुका है कि उसमें म्यूटेशन की यह प्रक्रिया अन्य विषाणुओं की भाँति निरन्तर होती रहेगी । इस विषाणु जनित रोग कॅरोना की दूसरी लहर हमारे देशवासियों पर कहर बनकर टूटी है । भारत विश्व के दूसरे अनुक्रम का सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश हैं । संयुक्त राष्ट्र वर्ल्डोमीटर के आंकड़ों के अनुसार भारत की वर्तमान जनसंख्या 133.26 ( लगभग 133 ) करोड़ है जो विश्व की जनसंख्या का 17.7% ( लगभग18%) है । कोविड-19 के संक्रमण से रक्षा हेतु देश में टीकाकरण अभियान का कार्य द्रुत गति से प्रगति पर है। नई रणनीति के अनुसार भारत मे टीकाकरण किए जाने योग्य जनसंख्या का आकार लगभग 84 करोड़ है । विश्व के 100 से अधिक ऐसे राष्ट्र हैं जिनकी जनसंख्या मात्र 3 करोड़ से भी न्यून है । आईएसओ मानक 3166-1 के अनुसार विश्व में कुल 223 देश हैं ,जिसमें प्रभुता संपन्न राष्ट्र एवं उनके अधीन बसे हुए क्षेत्र भी सम्मिलित है , अर्थात हमारा देश विश्व का एक विशालतम देश है और हम लगभग 40 देशों की जनसंख्या के तुल्य टीकाकरण अभियान चला रहे हैं । भारत में विभिन्न धर्मों की “गंगा-जमुनी संस्कृति” अनेक जाति ,धर्म , समुदाय की “सतरंगी जीवन शैली” है । देशवासी प्रतिमाह किसी न किसी बड़े धार्मिक त्यौहार, महापुरुष की जयंती, मेला आदि में “आनंद विभोर” रहते हैं । हम सामाजिक बंधनों में जटिलता से गुथे हुये हैं । एक दूसरे के घरों में जाकर मिलना, घंटों वार्तालाप करना , मिलकर भोजन करना , स्नेह भोज एवम भंडारे आयोजित करना,लंगर लगाना,एक दूसरे से गलबइयाँ करना,आगंतुक स्वागत करना,धार्मिक स्थलों पर एकत्रित होना,ग्रामीण अंचलों में चौपाल लगाना ,सायंकालीन गीत-संगीत , भजन कीर्तन करना हमारा प्राकृतिक स्वभाव है। हम अत्यंत मानवतावादी भी हैं एक दूसरे के सुख-दुख में बढ़-चढ़कर सहयोग करना यह हमारी मूलभूत संस्कृति भी है । संभवतः यूनानी दार्शनिक अरस्तू ने हमारे लिये ही कहा होगा कि ” मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है “। इसके अतिरिक्त हमारे देश में प्रतिवर्ष कहीं ना कहीं किसी ना किसी प्रांत में छोटे-बड़े चुनाव होते रहते हैं । हाल ही में देश के पाँच प्रांतों में विधानसभा के चुनाव संपन्न हुए,आगामी वर्ष भी चार प्रांतों में चुनाव होना निश्चित है । हमने हाल ही में विशाल कुंभ मेले में एक ही दिन में शाही स्नान हेतु 20 लाख लोगों का एकत्रीकरण किया अर्थात करोना की दूसरी लहर के संक्रमण के पूर्व हमने अपनी आस्था के समक्ष विज्ञान को महत्वहीन समझने की भूल की जिसके दुष्परिणाम ने देश का प्रत्येक परिवार प्रत्यक्ष / अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हुआ ।सत्तासीनों को नौकरशाहों ने वातानुकूलित बंद कमरों में चापलुसी पूर्वक कोविड डिफिट व वैक्सीन विक्टरी की मनगढन्त गाथा सुनाकर आत्ममुग्ध बना दिया जिससे वे अतिउत्साही होकर “चुनाव समर”में आँखे मूंदकर सबकुछ बिसर कर कूद गये, दूष्परिणामतः जनता को काफी क्षतिग्रस्त होना पड़ा । सत्तालोलुप्त राजनीतिज्ञों ने अपने स्वार्थ हेतु जनता की ” पिच्छलग्गु प्रवृत्ति ” का लाभ उठाकर उसे ” “काल के गाल “में धकेल कर मृत्यु से साक्षात्कार करवा दिया। उन्होंने पहली व दूसरी लहर के बीच किस प्रकार निश्चिंत होकर स्वार्थवश जनसाधारण का जीवन संकटापन्न कर दिया इससे हम अनभिज्ञ नहीं है। हमारे देश का स्वास्थ्य तंत्र वर्तमान में प्रश्नांकित हो चुका है । देश के स्वास्थ्य तंत्र का निर्माण कर्मचारी,पारंपरिक उपचार,स्वास्थ्य केंद्र एवम चिकित्सालयों का सम्मिश्रण से हुआ है । यह स्वास्थ्य तंत्र ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में उप स्वास्थ्य केंद्र, प्रारंभिक स्वास्थ्य केंद्र, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र,उप चिकित्सालय,चिकित्सालय ,जिला चिकित्सालय एवं आयुष महाविद्यालय के रूप में विकसित है । भारतीय स्वास्थ्य तंत्र में आयुर्वेदिक ,होम्योपैथिक, एलोपैथिक ,प्राकृतिक चिकित्सा, योग चिकित्सा ,ग्रामीण चिकित्सा एवं घरेलू नुस्खे सम्मिलित हैं । देश की अधिकांश जनसंख्या एलोपैथिक उपचार विधि पर विश्वास करती है । एलोपैथिक चिकित्सा का विशाल तंत्र शासकीय,अशासकीय वर्गों में विभक्त है । हमारे देश में निजी स्वास्थ्य तंत्र की प्रमुख भूमिका है, शहरों में यह 70% एवं ग्रामीण अंचलों में 63% सेवा प्रदाता है।निजी स्वास्थ्य क्षेत्र पर निर्भरता बढ़ने का प्रमुख कारण निःसंदेह शासकीय स्वास्थ्य क्षेत्र में देखभाल की “खराब गुणवत्ता”है । ग्रामीण क्षेत्रों में हमारी आबादी की लगभग 68% जनसंख्या है जबकि इस क्षेत्र में देश के डॉक्टरों की संख्या का मात्र 2% सेवा प्रदान की जा रही है। विगत 20 वर्षों में शहरी आबादी में ग्रामीणों के शहरों की ओर पलायन करने से 38 % की वृद्धि हुई है , जिसके कारण झुग्गी-झोपड़ी एवम स्लम एरिया का क्षेत्रफल बड़ा है । महामारी के संक्रमण की पहली लहर ग्रामीण अंचल प्रभावित नही हुआ किन्तु दूसरी लहर ने भारत के ग्रामों को बुरी तरह से प्रभावित किया । यद्यपि ग्रामों से प्रभावितों के आंकड़े आना शेष है किंतु मध्य प्रदेश , महाराष्ष्ट्र , उत्तर प्रदेश , बिहार , झारखंड के ग्रामीणों में इस दुष्काल का व्यापक प्रभाव परिलक्षित हुआ है । कटु सत्य यह है कि आज भी हमारे ग्रामीण क्षेत्र मलेरिया , टॉयफाइड ,हैजा जैसे संक्रमणों से निपटने में भी सक्षम नही है तभी तो कॅरोना ने यहां कहर बरपा दिया ।ग्रामों के लगभग 10% स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टर हैं ही नही शेष में से अधिकांश में हैं तो वे ग्रामों में निवास नही करते अर्थात पर्याप्त सेवा प्रदान नही करते ।स्वास्थ्य , महिला एवम परिवार कल्याण , जनजाति विकास , ग्रामीण विकास , जल संसाधन , पेयजल विभाग ,आयुष , खाद्य एवम आपूर्ति मंत्रालय , सर्व शिक्षा अभियान , राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन आदि सेवाओं में जुटे हैं किंतु ग्रामीण स्वास्थ्य की दुर्दशा अवर्णनीय है ।भारत के चिकित्सा कर्मचारियों, चिकित्सकों,स्वास्थ्य विशेषज्ञों, के अनुभव,परिश्रम एवं उनकी योग्यता के कारण भारत की स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता प्रथम विश्व मानकों के लगभग है कहीं-कहीं व कभी-कभी उससे भी अधिक हैं । ग्रामीण ‘ब्लॉक स्तरीय ओप्रेशनल प्लान’ ने “आशा कार्यकर्ताओं ” का विशाल नेटवर्क खड़ा कर दिया है वर्तमान में देश मे “आशा कार्यकर्ताओं” की संख्या लगभग 10 लाख व आंगनवाड़ी वॉलंटियर्स लगभग 06 लाख हैं इसके साथ ही ‘ सखी मंडल ‘ के अनेक प्रतिनिधी सेवा में संलग्न है । “कनवर्जन ” के द्वारा देश की कई सामाजिक एवम अशासकीय संस्थाओं को सम्बद्ध किया गया है इतनी व्यवस्थओं के उपरांत भी चमकी बुखार , चिकनगुनिया , डेंगू से प्रतिवर्ष होने वाली मृत्यु की संख्या में कमी के सुखद परिणाम अप्राप्त हैं । जिसका स्पष्ट कारण है ग्रामीण क्षेत्र में स्वास्थ्य की आधारभूत संरचना का अभाव । कॅरोना की दूसरी लहर ने हमारे देश की स्वास्थ्य व्यवस्थओं की पोल खोल दी है । अनेक ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य केंद्र नाम मात्र के हैं व जर्जर होकर पशु बांधने के स्थान बन गये हैं । नगरीय शासकीय चिकित्सालय की गुणवत्ता व सेवा प्रदाय प्रणाली संतोषप्रद श्रेणी की प्रमाणित नहीं हो पा रही है । यही कारण है कि इस महामारी में सड़कों पर भागते , दम तोड़ते लोग देखे गए अस्पतालों में बैड न मिलना ऑक्सीजन की घोर कमी, ऑक्सीजन सिलेंडर, ऑक्सीजन कंसंट्रेटर ,रेमेडीसीवर इंजेक्शन, टोसिलीजुम्ब इंजेक्शन , फैविफ्लूए आदि जीवन रक्षक औषधियों एवम अन्य सामान्य दवाइयों का “आम बाजार”से लुप्त होकर ” कला बाजार ” में विक्रय होने जैसी दुर्भाग्यपूर्ण स्तिथी ने हमारी व्यवस्थाओं को बौना साबित कर दिया दूसरी ओर डोमडों / खोसों / कफनखसोटों ने कालाबाजारी की गंदगी से समाज को”बज-बजा” कर दुर्गंधित कर दिया । उपरोक्त वर्णित औषधियों , जीवनरक्षक सामग्री एवं उपकरणों को विवशता में जो सक्षम थे उन्होंने 10-10 गुना दाम में “काला बाजार” से क्रय किया एवम साधारण व्यक्ति की पहुंच के बाहर होने से इनके अभाव में अनेकों जाने चली गई ।डोमड़े/ खोसे / कफनखसोट – पुरातन काल के युद्ध में एक ऐसी टोली के सदस्य हुआ करते थे जो सेना के सबसे पीछे चला करते थे यह किसी भी पक्ष के न होकर अवैतनिक होते थे । उभय पक्षों के शहीदों के कवच,आभूषण , अन्य सामग्री,वस्त्र,युद्ध क्षेत्र में पड़ी टूटी तलवारें व अन्य वस्तुओं को लूट के ले जाना मात्र उनका उद्देश्य होता था।मध्य एशिया में इस टोली के सदस्य उपरोक्त वर्णित नामों से ही जाने जाते थे । आज भी समाज मे इस प्रजाति / नस्ल के लोग सूटेड-बूटेड व आलीशान इमारतों में पाये जाते हैं ।जो मृत्यु (महामारी ) की प्रतीक्षा में रहते है व अवसर पाते ही कालाबाजारी व नकली दवाइयों का व्यवसाय कर जीते जी मनुष्य को लूट कर उसका जीवन संकटापन्न कर उसे मृत्यु की ओर धकेल कर अपनी धनलोलुप्ता की क्षुधा को शांत करते हैं । इस महामारी में शासकीय संस्थाओं की अलोकप्रियता का भरपूर लाभ निजी चिकित्सालयों ने उठाया तथा स्वेच्छा पूर्वक निजी अस्पतालों को “चोक कर ” मध्यम व निम्न वर्ग के लोगों को भर्ती करने व उपचार हेतु स्वतः के लिए इस “आपदा को अवसर”में परिवर्तित कर उनसे खूब रुपया ऐंठा व मनचाहा धन संग्रहित किया । कोविड-19 के संक्रमण के साथ-साथ ब्लैक फंगस (म्युकर माइकोसिस ) यलो फंगस , व्हाइट फंगस, ग्रे फंगस ने हमारे चिकित्सकों एवम स्वास्थ्य कर्मियों की “नाक में दम” कर दिया है , वे साधुवाद के पात्र हैं कि इन जानलेवा बीमारियों से लड़ रहे हैं , जूझ रहे हैं तथा मृत्यु दर यह इंगित करती है कि हमारा चिकित्सीय तंत्र विजय भी प्राप्त कर रहा है किंतु चिकित्सा तंत्र की विजय के समक्ष स्वास्थ्य तंत्र की असफलता का विशाल पहाड़ खड़ा है । हमारे चिकित्सा तंत्र के जाँबाज सेवक बीमारी से तो युद्ध जीत जाएंगे किंतु औषधियों की कमी ,नैदानेय उपकरणों के अभाव , वह निजी अस्पताल के संचालकों की स्वेच्छाचारिता से कैसे जीत पायेगे । संक्रमण के चरम पर मरीजों की सीटी स्कैन , एक्सरे रिपोर्ट , पैथोलॉजी लैब की रिपोर्ट, RT-PCR रिपोर्ट काफी विलंब से प्राप्त हो रही थी , रिपोर्ट के अभाव में मरीज अस्पताल में भर्ती नहीं हो पा रहे थे । यह हमारे स्वास्थ्य तंत्र के “चरमरा जाने ” का प्रमाण है ।औषधियों की वितरण प्रणाली का छिद्रित हो जाना , कालाबाजारी का बजबजा जाना, दवाओं की अनुपलब्धता व काला बाजार में उनकी आसमानी कीमतों में उपलब्धता ने जनसाधारण के आत्मविश्वास को डगमगा दिया । इन अव्यवस्थाओं के कारण राष्ट्रीय ,अंतरराष्ट्रीय समाचार पत्रों में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में हमारी काफी भर्त्सना हुई । अनलॉक के उपरान्त बाजारों में जो दृश्य दृष्टिगोचर हो रहे हैं , संदेह का कारण है कि क्या ” कोई माई का लाल “देश मे कॅरोना की तीसरी लहर को रोक पायेगा ? आवश्यक वस्तुओं की खरीदारी करने जाने पर लगता है कि — ” हर एक सांस ही हम पर हराम हो गई है , यह जिंदगी भी कोई इंतकाम हो गई है ।” कुछ दिनों पूर्व प्रतीत होने लगा था कि हमारी व्यवस्था दूसरी लहर से सबक लेकर चौकन्ना हो गई है किंतु अब लगता है कि राजनीति पुनः “चुनाव मोड”में आ गई है वैज्ञानिकों का कहना है कि संभावित तीसरी लहर बच्चों को अपेक्षाकृत अधिक प्रभावित करेगी जिसके कारण हमारी आधी आबादी अर्थात हमारी मातृ शक्ति ( महिलायें ) भी प्रभावित होंगी।”वायरस जिनोमसीक्वेनसिंग स्टडी” से “डेल्टा प्लस” नामक म्यूटेशन की जानकारी प्राप्त हो रही है ।अतः वर्तमान परिवेश में हरित क्रांति , श्वेत क्रांति , इंद्रधनुषी क्रांति के अनुरूप स्वास्थ्य क्रांति भी अवश्यंभावी हो गई है । जिसमें इन्फ्राट्रक्चर, स्वास्थ्य कर्मीयों की वृद्धि , नैदानेय उपकरणों की उपलब्धता, आवश्यक औषधियों की पूर्ति, मेडिकल ऑक्सीजन की प्रचुरता, वेंटिलेटर एवं अन्य उपकरणों की पर्याप्त संख्या व उनके उपयोग करने का परीक्षण आदि की सुनिश्चित किया जाना चाहिये साथ ही स्थानीय निकायों खासकर ग्राम पंचायतों को, ग्राम सभाओं के माध्यम से स्थानीय युवक युवतियों को प्रशिक्षित करके स्थानीय समाज में स्वास्थ्य के प्रति पर्याप्त जागरूकता का संचार किया जाना आवश्यक हो गया है । सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 21 की व्याख्या में स्पष्ट किया है कि भारत के नागरिक हेतु अनुच्छेद 21 में “स्वास्थ्य का अधिकार” अंतर्निहित है । इसी प्रकार संविधान के अध्याय 4 राज्य के नीति निदेशक तत्व के अनुच्छेद 39(e) 41,42,47,48 में “स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली” को दूर करने का दायित्व राज्य को सौंपा गया है । अनुच्छेद 15 (1)(H)में हर नागरिक में वैज्ञानिक मनोवृति एवं सुधार विकसित करने के कर्तव्य की अपेक्षा शासन से की गई है । यह दुखद है कि इस महामारी में हम अपनी आबादी के मात्र 2.25% कॅरोना मरीजों के उपचार करने में पर्याप्त समर्थ नहीं हो पाये , शासकीय एवम लूट का अड्डा बन चुके निजी चिकित्सालय 15 माह के पूर्ण दुष्काल में मात्र दशमलव 225% मरीजों को उपचार देने में कतिपय कारणों से असमर्थता प्रकट करते रहे व हमारे प्रशासक एवं शासक इस परिस्थिति को तथा निजी अस्पतालों की स्वेच्छाचारिता को मूक दर्शक बनकर देखते रहे । इन सभी तथ्यों को दृष्टिगत रखते हुए संक्रमण की संभावित तीसरी लहर के पूर्व स्वास्थ्य की समुचित व्यवस्था हेतु देश में “स्वास्थ्य कांति” योजना का क्रियान्वयन तत्काल प्रभाव से किया जाना नितांत आवश्यक हो गया है ।

नरेश शर्मा ,राज्य पुलिस सेवा , नगर पुलिस अधीक्षक (से.नि.) जबलपुर ( म.प्र.)

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