रासुका पर हंगामा है क्यों बरपा : नरेश शर्मा

अवाँछित एवम असामाजिक तत्वों को नियंत्रित करने हेतु शासन/ प्रशासन द्वारा अलोकप्रिय,सशक्त एवं कटु निर्णय लेना अपरिहार्य हो जाता है, जिसके कारण उन्हें आलोचना और निंदा का सामना करना पड़ता है । वर्तमान में बहुचर्चित कानून रा.सु.का / रा.सु.अ. (राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम -N.S.A ) यू.ए.पी.ए . (अवैधानिक गतिविधि निवारक अधिनियम ) राष्ट्रद्रोह- भारतीय दंड संहिता की धारा 124(ए) ऐसे विधान है , जिन पर कतिपय कारणों से विभिन्न प्रकार की सार्वजनिक टिप्पणियाँ हो रही है । अभी 2 दिन पूर्व ही दिल्ली हाईकोर्ट ने यूएपीए एक्ट में दिल्ली के महाविद्यालयों के दंगा फैलाने के आरोप में गिरफ्तार 3 छात्रों की प्रतिभूति (जमानत) पर उन्मुक्त (रिहा) किया है । उनके जमानत आवेदन पत्र पर दिल्ली उच्च न्यायालय ने उनकी जमानत स्वीकारते हुए 100 पृष्ठ का आदेश पारित है । दिल्ली पुलिस ने सर्वोच्च न्यायालय में उक्त आदेश के विरुद्ध याचिका प्रस्तुत की तथा छात्रों को जेल से मुक्त नहीं होने दिया । छात्रों की ओर से यह ज्ञात होने पर दिल्ली उच्च न्यायालय ने दिल्ली के कड़कड़डूमा जिला एवम सत्र न्यायालय को प्रकरण में संज्ञान लेकर छात्रों को तुरन्त रिहा कराने हेतु आदेशित किया तब जाकर तीनो छात्र जेल से उन्मुक्त हो सके । उच्च न्यायालय दिल्ली के द्वारा पारित जमानत के उक्त निर्णय पर सर्वोच्च न्यायालय ने उसे रूलिंग/ दृष्टांत जिसे हम साधरण बोल-चाल की भाषा में नजीर कहते हैं,के रूप में उपयोग करने पर पाबंदी लगा दी है तथा दिल्ली पुलिस की याचिका को विचारण में ले लिया है । इसी प्रकार “राष्ट्रद्रोह कानून” वस्तुतः भारतीय दंड विधान ( I.P.C. )की धारा 124 (ए) के अंतर्गत वर्तमान में की गई कार्यवाहियों पर भी विभिन्न अपीलेंट कोर्ट्स ने समय-समय पर विभिन्न प्रतिकूल टिप्पणियाँ की है । वर्तमान कोविड-19 के संक्रमण के इस दुष्काल में कतिपय तत्वों ने पीड़ितों की सेवा में संलग्न अनुकरणीय प्रतिबद्धता प्रदर्शित करने वाले स्वास्थ्य कर्मियों को प्रताड़ित कर उनके साथ हिंसक व्यवहार भी किया है अतः ऐसे तत्वों को नियंत्रित करने हेतु शासन/ प्रशासन ने विविध अधिनियमों के अतिरिक्त उनके विरुद्ध रासुका (राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम) के अंतर्गत निरोधात्मक आदेश पारित कर उन्हें जेल में निरुद्ध कर दिया है । इस महामारी में “आपदा को अवसर” में परिवर्तित करने की अपनी मंशानुप गढ़ीत परिभाषा के अनुसार कालाबाजारियों ने धनलोलुपता के चलते जीवन रक्षक औषधियों को पड़यँत्र पूर्वक “सामान्य बाजार” से लुप्त कर दिया व “काला बाजार” में इन औषधियों एवं नैदानेय उपकरणों, ऑक्सीजन सिलेंडर को गगनचुंबी दामों में विक्रय किया । पराकाष्ठा यह हुई कि तत्कालीन अत्यंत महत्वपूर्ण जीवन रक्षक इंजेक्शन रेमेडीसीवर की कूटरचना गुजरात के मोरबी थानांतर्गत क्षेत्र में की गई तथा कूटरचित (नकली) इंजेक्शन की देश में विभिन्न स्थानों पर उपलब्ध करा दिये। जिसमें मध्य प्रदेश के कुछ बड़े शहर भी अप्रभावित नहीं रहे । जबलपुर के निजी चिकित्सालय “सिटी हॉस्पिटल” के संचालक सरबजीत सिंह मोखा व उनके सहयोगी चिकित्सा कर्मियों ने इन नकली रेमडिसीविर इंजेक्शन को 500 की संख्या में प्राप्त कर अपने चिकित्सालय में भर्ती कॅरोना महामारी के उपचाररत मरीजों को लगा दिये।यह विवेचनाधीन है कि ये नकली इंजेक्शन कितनी संख्या में, कितने मरीजों को लगाये गये व उन मरीजों का क्या हश्र हुआ ? गुजरात के मोरबी थाना की पुलिस द्वारा नकली रेमडीसीवर इंजेक्शन की निर्माता कंपनी को पकड़ने में सफलता अर्जित की । गुजरात पुलिस की “जांच की आंच” जबलपुर (मध्य प्रदेश) तक पहुंची एवम विवेचना के अनुक्रम में इस निकृष्ट कृत्य में संलग्न सिटी हॉस्पिटल के संचालक व उसके सह-अपराधियों का “भांडा फूटा” संबंधित सभी विभिन्न विधानों की विभिन्न धाराओं में गिरफ्तार किए गये है तथा वे न्यायिक अभिरक्षा में सेंट्रल जेल जबलपुर में बन्दी हैं । स्थानीय प्रशासन द्वारा हॉस्पिटल के संचालक सरबजीत सिंह मोखा व होस्पिटल के फार्मासिस्ट के विरुद्ध राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम की धारा 3(2) के अंतर्गत निरोधात्मक आदेश भी जिला दंडाधिकारी/ कलेक्टर, जबलपुर के द्वारा पारित कर दोनों के जेल वारंट जारी किये गये, जिसके पालनार्थ वे दोनों रासुका के अंतर्गत भी निरोधित हैं । निरुद्ध मोखा के अधिवक्ता द्वारा रा.सु.का. में उसे निरोध किये जाने के आदेश के विरुद्ध माननीय उच्च न्यायालय , जबलपुर में आपत्ति प्रकट करते हुए निरोध आदेश को चुनौती दी है । मेरे 37 वर्षों का पुलिस विभाग की सेवा का अनुभव व विधि का छात्र होने कारण जबलपुर के समाचार पत्रों के संपादक एवम पत्रकार मित्रगण , सरबजीत सिंह मोखा पर हुई रासुका की कार्यवही एवं उसके वकील द्वारा माननीय उच्च न्यायालय में दी गई चुनौती पर मेरी टिप्पणी चाह रहे हैं । अतः सर्वप्रथम तो यह है कि किसी भी अधिवक्ता का कर्तव्य अपने पक्षकार को वैधानिक सहायता प्रदान करते हुये उसे प्रकरण विशेष में लाभान्वित करना होता है । मोखा के विद्वान अधिवक्ता भी अपने पक्षकार को राहत दिलाने के अपने कर्त्तव्य का निर्वाह कर रहे हैं , जो उचित भी है। प्रश्न यह भी किया गया कि क्या मोखा के विरुद्ध की गई रासुका की कार्रवाही को माननीय उच्च न्यायालय द्वारा उचित ठहराया जाना संभव है अथवा नही ? इस बिंदु पर विनम्र आग्रह है कि जब भी कोई प्रकरण , माननीय न्यायालय में लंबित अथवा विचाराधीन हो तो उस पर टिप्पणी करना अथवा उसका “मीडिया ट्रायल”करना सर्वथा अनुचित होता है । अतः यहाँ मात्र राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम 1980 के प्रावधानों पर संक्षिप्त प्रकाश डाला जा रहा है । वर्तमान राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम 1980 , श्रीमती इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री काल में प्रभावशील हुआ है विगत दिनों कई व्यक्तियों के विरुद्ध इस अधिनियम का प्रयोग कर उन्हें लोक व्यवस्था बनाये रखने हेतु राष्ट्रहित में जेल में निरुद्ध किया गया है । यह अधिनियम (कानून ) सरकार को किसी व्यक्ति विशेष को “फॉर्मल चार्ज” लगाये बिना और बिना सुनवाई के अभिरक्षा में लेने की शक्ति और अधिकार प्रदान करता है । विशुद्ध रूप से यह एक निवारक निरोध एवं प्रतिबंधात्मक प्रक्रिया है । भारतीय संविधान के अनुच्छेद 22(3) एवम 22(4) में संयुक्त रूप से राज्य की सुरक्षा एवं सार्वजनिक व्यवस्था की स्थापना हेतु , व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर,उपरोक्त अनुसार निवारण निरोध एवं प्रतिबंध सहित किसी व्यक्ति को अधिकतम 3 माह की अवधि तक निरुद्ध करने ( जेल में हिरासत में रखने ) की अनुमति प्रदान की गई है । माननीय उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की अध्यक्षता में गठित सलाहकार बोर्ड द्वारा विस्तारित निरोध हेतु पर्याप्त कारण सहित प्रतिवेदन प्रेषित करने पर यह निरोध कालावधी अधिकतम 12 माह ( 1 वर्ष ) की हो सकती है किन्तु सरकार को नवीन साक्ष्य मिलने पर यह अवधि एक वर्ष से भी अधिक बढ़ाई जा सकती है । व्यक्ति विशिष्ट को हिरासत में लेकर जेल दाखिल करने का यह आदेश वस्तुतः प्रशासनिक आदेश है । जिसके विरुद्ध उक्त व्यक्ति को अपराधिक न्यायालय ( क्रिमिनल कोर्ट ) में जमानत हेतु याचिका प्रस्तुत करने का अधिकार नहीं है किंतु अनुच्छेद 22(5) के अंतर्गत प्रक्रियात्मक सुरक्षा का प्रावधान है । इसके अंतर्गत अभिरक्षा में निरुद्ध व्यक्ति को सलाहकार बोर्ड के समक्ष प्रभावी प्रतिनिधित्व करने का अधिकार प्राप्त है।इसके अतिरिक्त “हैबियस कॉरपस”( बन्दी प्रत्यक्षीकरण ) याचिका भी “अनियंत्रित राज्य शक्ति “के विरुद्ध प्रत्याभूतित ( गारंटीकृत )सुरक्षा प्रदान करती है । विगत लगभग 200 वर्षों से भारत में इस प्रकार के निरोधात्मक अधिनियम प्रयोग में लाये जा रहे हैं । स्वतंत्रता के पूर्व 1818 से 1919 तक 100 वर्ष बंगाल रेगुलेशन एक्ट-( lll ) तदोपरांत 1939 से 1947 तक अंग्रेजी हुकूमत ने रोलेट एक्ट के अंतर्गत हम भारतीयों पर निरन्तर अत्याचार किये गये। स्वतंत्रता के उपरांत भी इस प्रकार के निरोधात्मक कानून आवश्यकता प्रतीत हुई । अतएवं 1950 से 31-12-1969 तक निवारक निरोध अधिनियम (प्रीवेंटिव डिटेंशन एक्ट-पी.डी.ए.) 1971 से 1977 तक मीसा ( MISA -आंतरिक सुरक्षा अधिनियम )एवं 27-12- 1980 से निरंतर यह अधिनियम प्रभावशील है । इस अधिनियम की धारा 3(2) में स्पष्ट है कि भारत सरकार अथवा किसी राज्य सरकार को विश्वास करने का यह युक्तियुक्त कारण हो तथा वह प्राप्त सूचना से संतुष्ट है कि किसी व्यक्ति को ऐसा हानिकारक कार्य करने से रोकने हेतु जो राज्य की लोक व्यवस्था बनाए रखने में बाधक होगा अथवा समाज के लिए आवश्यक सेवा व पूर्ति की व्यवस्था बनाये रखने के लिए संकटापन्न होगा तब वह इस अधिनियम के अंतर्गत उक्त व्यक्ति विशिष्ट को निरोध में लेने का निर्देश पारित करेगा । शासन की ओर से यह आदेश जिला- दंडाधिकारी/ कलेक्टर या जहाँ पुलिस आयुक्त प्रणाली हैं वहां पुलिस आयुक्त द्वारा पारित किया जाता है । अधिनियम की धारा 3(2) में वर्णित स्पष्टीकरण का लाभ उठाने की मंशा से प्रश्नांकित याचिका माननीय उच्च न्यायालय में दाखिल की गई है जिसमें निरुद्ध याचिकाकर्ता को सफलता मिलने की संभावना क्षीण एवम संदेहास्पद प्रतीत होती है । शासन/प्रशासन द्वारा रा.सु.का. के अंतर्गत की गई उक्त कार्यवाही को माननीय न्यायालय द्वारा उचित ठहराये जाने की युक्तियुक्त संभावना है । इस राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम की कमियाँ यह है कि चूंकि इस प्रकरण में प्रथम सूचना पत्र (F.I.R ) अंकित नहीं की जाती है अतः एन.सी.आर.बी (राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो ) में निरुद्ध व्यक्तियों के आंकड़े होते ही नहीं हैं अर्थात ज्ञात नहीं हो सकता कि कितने व्यक्तियों को, कितनी अवधि में, कब से कब तक के लिए , किस स्थान पर निरुद्ध किया गया । इसी प्रकार दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 50 गिरफ्तारी के आधार जानने का एवम जमानत का अधिकार , धारा 56 व 76 के अंतर्गत गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर न्यायिक दंडाधिकारी के समक्ष प्रस्तुत करने का अधिकार प्राप्त नहीं है । यह अधिनियम उक्त धाराओं का उल्लंघन है इसी प्रकार संविधान के मौलिक अधिकारों पर भी इस विधान का प्रतिकूल प्रभाव है । माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने इस अधिनियम हेतु टिप्पणी भी की है कि सामाजिक सुरक्षा और नागरिक स्वतंत्रता के मध्य नाजुक संतुलन है जिसे सुरक्षित रखते हुये व्यक्ति के मौलिक अधिकार एवं जनता सार्वजनिक हित के दृष्टिगत शासन से निष्पक्ष एवं सशक्त कार्यवाही करने की अपेक्षा है । इस अधिनियम में आदेश पारित करने वाले अधिकारी ( जिला दंडाधिकारी / कलेक्टर ) को वैधानिक कार्यवाही से सुरक्षा प्रदान की गई है अर्थात उस अधिकारी के विरुद्ध इस अधिनियम के अंतर्गत पारित निरोध आदेश के तारतम्य में कोई भी अभियोजन अथवा कानूनी कार्यवाही नही की जा सकती है।

नरेश शर्मा , रा.पु.से. , नगर पुलिस अधीक्षक ( से.नि.) जबलपुर ( म.प्र )

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