मृत्यु प्रमाण पत्र प्राप्ति अत्यंत दुर्गम काज

जन्म व मृत्यु सबसे महत्वपूर्ण घटना है मानव जीवन की । जन्म से अस्तित्व का प्रारंभ होता है व मृत्यु पर समाप्त हो जाता है अर्थात जीवन पर विराम लग जाता है । वैधानिक अस्तित्व भी जीवन से मृत्यु के मध्य ही स्थापित है । जब भारतीय जनमानस वैश्विक महामारी की पीड़ा व कोविड-19 के प्रकोप से अपनों को खोने के दुख में विव्हल था तब मध्य प्रदेश शासन द्वारा पाँच महत्वपूर्ण योजनाओं की घोषणा की गई :

(1) मुख्यमंत्री कोविड-योद्धा कल्याण योजना ।

( 2 ) मुख्यमंत्री कोविड-19 विशेष अनुग्रह योजना

( 3 ) मुख्यमंत्री कोविड- 19 अनुकंपा नियुक्ति योजना

(4 ) मुख्यमंत्री कोविड-19 बाल सेवा योजना एवम

( 5 ) कॅरोना महामारी से मृत व्यक्ति के परिवार को ₹100000/- की सहायता निधी प्रदान करने की योजना ।

ये सभी योजनायें स्वागत योग्य हैं । इन योजनाओं में पूर्व की चार योजनाएं कोविड योद्धाओं हेतु हैं , मात्र पांचवें अनुक्रम की योजना ही जनसामान्य से संबंधित है । इस योजना की घोषणा 20 मई 2021 को की गई है किंतु अभी तक इस हेतु न तो कोई नियम बनाये गये व न हीं आवेदन पत्र आहूत किये गये हैं । शेष योजनाओं की भी अद्यतन यही स्थिति है । पांचवी योजना की घोषणा से मृतकों के परिवारजनों को पुनः एक बार अस्पतालों के चक्कर लगाने हेतु विवश होना पड़ रहा है । निजी व शासकीय चिकित्सालयों में मृत्यु प्रमाण पत्र पाने हेतु लोगों का ताँता लगा हुआ है तथा इसकी प्राप्ति “युद्ध विजय”जैसा कार्य प्रमाणित हो रही है। विशेषकर शासकीय चिकित्सालयों में प्रमाणपत्र न दिए जाने हेतु विभिन्न स्वांग रचे जा रहे हैं उदाहरणार्थ अभी ( 1 ) वार्ड से रजिस्टर नहीं आया है ( 2 ) संबंधित डॉक्टर / आर.एम.ओ. अथवा वार्ड इंचार्ज के हस्ताक्षर नहीं हुये है ( 3 ) रिकॉर्ड कीपर ( लिखित अभिलेख रखने वाला लिपिक ) उपलब्ध नहीं है , आदि कई कारणों से अनेकों चक्कर लगाने के उपरांत दुर्लभ रूपेण प्रमाण पत्र प्राप्त हो रहा है । विडंबना देखिये मानव की,कि जिस प्रियजन के बिछोह से रो-रो कर उनकी आँखों से आँसू सूख गये थे, उनकी मृत्यु का प्रमाणपत्र पाना मानो गरीबी व विवशता के कारण प्राप्तकर्ता की प्रसन्नता का विषय बन गया है , “किंतु पिक्चर अभी बाकी है” मेरे भाई , “युद्ध समाप्त नहीं हुआ है अभी”, अपितु यह एक पड़ाव का पार करना मात्र है ,”अभी आगे बहुत लड़ाई है”। कारण यह कि सभी चिकित्सालयों से कोविड-19 कॅरोना के उपचार हेतु भर्ती मरीजों की मृत्यु होने पर उनके मृत्यु प्रमाणपत्रों अथवा उपचार प्रमाण पत्रों पर उनके “बेड हेड टिकिट ” की संक्षेपिका ( समरी रिपोर्ट ) में मृत्यु का कारण ” हृदय गति अवरुद्ध होना” ( हार्ट अटैक / कार्डियक अरेस्ट / मायोकार्डियल इंफाक्शन ) अथवा ”श्वसन तंत्र का अवरुद्ध होना” ( फेल्युवर ऑफ रेस्पायरेट्री सिस्टम )ही लिखा जा रहा है । इससे यह प्रमाणित नहीं होता कि रोगी की मृत्यु करोना ( कोविड 19 ) के प्रभाव से अथवा उससे उपजी जटिलता के कारण हुई है । संबंधित विभाग जिसे मृतक के परिवारजनों को तथाकथित सहायता राशि अथवा अनुदान प्रदान करना है वह इस प्रकार के मृत्यु प्रमाण पत्र को उपयुक्त होना स्वीकार नहीं कर रहे । उनका यह निर्णय त्रुटिपूर्ण भी नही है क्योंकि मृत्यु प्रमाण पत्र पर मृत्यु का कारण- कॅरोना रोग अथवा कोविड 19 संक्रमण से मृत्यु होना लिखा ही नही जा रहा है । ऐसा प्रतीत होता है कि यह भी पूर्व निर्धारित योजना का अंश है । मुझे दीर्घ पुलिस सेवा ( लगभग 38 वर्ष ) का अनुभव है एवं मैंने लगभग 29 वर्ष थाना प्रभारी के रूप में ( उप निरीक्षक एवम निरीक्षक ) कार्य किया है तत्समय जन्म एवं मृत्यु की सूचना ग्राम कोटवारों द्वारा संबंधित थाने में दी जाती थी तब थाना प्रभारी का यह कर्तव्य होता था कि वह अपने थाना में “जन्म मृत्यु पंजीकरण पंजी ” का संधारण करें तथा सूचना के आधार पर उसके सत्यापन उपरांत संबंधित को सांख्यकी विभाग द्वारा प्रदत्त प्रारूप में ” जन्म अथवा मृत्यु का प्रमाण पत्र” निःशुल्क प्रदान करें । थाना प्रभारी से यह भी अपेक्षा की जाती थी कि वह इस आशय की संधारित पंजी की सत्यापित प्रतिलिपि नियत तिथि पर सांख्यिकी विभाग को समुचित कार्यवाही हेतु प्रेषित करें । अतः थाना प्रभारी को जन्म मृत्यु पंजीकरण अधिनियम 1969 एवम मध्य प्रदेश जन्म जन्म मृत्यु पंजीकरण नियम 1999 की पूर्ण माहिती ( जानकारी ) होना अपरिहार्य होता था। वर्तमान में कार्य अधिकता अथवा अन्य प्रशासनिक कारणों से अब यह पंजीयन थाना में नहीं होता है तथा इस प्रकार की पंजी का संधारण भी थानों में नहीं किया जाता है । अब यह पंजीयन ग्राम कोटवार की पंजी ( कोटवरी किताब ) अथवा अन्य स्रोत के आधार पर ग्राम पंचायत,नगर पंचायत,नगर पालिका एवं नगर निगम में आवश्यक प्रक्रिया के रूप में निरंतर है । जन्म मृत्यु पंजीकरण अधिनियम 1969 की धारा 10(1) में यह स्पष्ट उल्लेख है कि उपचारकर्ता चिकित्सक या व्यक्ति विशेष की मृत्यु के समय उपस्थित चिकित्सक का यह कर्तव्य है कि वह उस व्यक्ति के ” बेड हेड टिकिट ” ( उपचार के प्रपत्र ) में “मृत्यु का कारण” स्पष्टरूपेण अंकित करें , जिसके अनुरूप मृत्यु प्रमाण पत्र भी स्पष्ट बनाया जा सके । चूंकि इस अधिनियम के प्रावधान अत्यंत दुर्बल एवम मृतप्राय हैं,संबंधित द्वारा इसका पालन न करने पर मात्र ₹50/- के अर्थदंड की शास्ति ( सजा ) निर्धारित है जो किसी भी दाण्डिक न्यायालय द्वारा “समरी ट्रायल ” ( सारांश परीक्षण ) में तत्काल पारित कर प्रकरण का निराकरण कर दिया जाता है। अतः इस अधिनियम से संबंधित व्यक्ति अथवा चिकित्सक कदापि भयभीत नहीं हैं । मध्य प्रदेश जन्म मृत्यु पंजीकरण नियम 1999 के नियम 7 में दर्शित प्रारूप में स्पष्टतः अंकित है कि चिकित्सक द्वारा दिए जाने वाले मृत्यु प्रमाण पत्र में मृत्यु का कारण स्पष्ट रूपेण उल्लेखित किया जाना अनिवार्य है । वस्तुतः चिकित्सालय से पारित किए जाने वाले इस प्रमाण पत्र को ” मृत्यु का कारण प्रमाण पत्र ” ही कहा जाता है । वर्ल्ड हेल्थ असेंबली द्वारा भी यह निर्णय लिया गया है चिकित्सा प्रमाण पत्र में रुग्णता ( मोरबिड / बीमारी ) या ऐसी चोट जो हिंसा से पहुँचाई गई है जिससे मृत्यु कारित हुई है ,का स्पष्ट उल्लेख किया जाना चाहिये। शासकीय / अर्धशासकीय अथवा निजी चिकित्सालय के डॉक्टरों द्वारा इंग्लिश के शब्द ” कॉज आफ डेथ ( मृत्यु का कारण ) एवं मोड ऑफ डेथ ( मृत्यु के प्रकार ) से पीड़ित पक्षों को भ्रमित किया जा रहा है या वे स्वतः ही इन दोनों शब्दों से भ्रमित हैं । उनके द्वारा मृत्यु का कारण के कॉलम में उपरोक्त अनुसार हृदय गति अथवा श्वसन तंत्र का बाधित होना अंकित किया जा रहा है वस्तुतः मनुष्य की मृत्यु इन्ही दो कारणों से होती है किन्तु ये तंत्र किस कारण निष्क्रिय , बाधित अथवा अवरुद्ध हुये यह उल्लेखित नहीं किया जा रहा है । चिकित्सकों का यह दायित्व है कि वे कॅरोना रोग से हुई मृत्यु के मृतकों के मृत्यु प्रमाण पत्र में यह स्पष्ट रूप से वर्णित करें कि यह दोनों तंत्र अथवा इनमें से कोई एक तंत्र जिसके कारण व्यक्ति विशेष की मृत्यु कारित हुई है वह कोविड-19 विषाणु जनित रोग कॅरोना अथवा उसके संक्रमण की जटिलता से उतपन्न हुई है , किन्तु वे अपने इस दायित्व का निर्वाह नही कर रहे हैं । यदि चिकित्सक इन चिकित्सीय शब्दों से स्वतः ही भ्रमित है तो उन्हें रिफ्रेशर कोर्स अर्थात “पुनश्चर्या पाठ्यक्रम ” में भेज देना चाहिये । शासन एवम प्रशासन से यह अपेक्षा है कि वे इस हेतु जनहित में चिकित्सकों को समुचित निर्देश दें । अब प्रश्न उठता है कि वे लोग जो कोविड 19 से संक्रमित होने के उपरान्त कतिपय कारणों से अस्पताल उपचार हेतु गये ही नहीं अथवा जिन्हें शासकीय या निजी अस्पतालों में भर्ती ही नहीं किया गया व उनकी मृत्यु हो गई तो यह कैसे निर्धारित किया जायेगा कि उनके परिवारजन अनुदान के पात्र हैं अथवा नहीं ? अतः उनकी कोविड-19 की पॉजिटिव रिपोर्ट को इस आशय हेतु पर्याप्त आधार माना जाना चाहिये। ग्रामीण अंचलों में ऐसे लोग भी हैं जिन्होंने कतिपय कारणों से कोविड 19 का परीक्षण ही नही कराया व इसी रुग्णता से उनकी मृत्यु हो गई । शासन से यह भी अपेक्षा है कि वे इस हेतु प्राधिकृत प्रशासकीय अधिकारियों को आदेशित करें कि वे उच्चतम न्यायालय द्वारा हाल ही में पारित आदेश का पालन करें जिसमे वर्णित है कि महामारी में मृत व्यक्ति के परिवारजनों को अनुदान प्रदान कर यथासम्भव क्षतिपूर्ति करना राज्य का दायित्व है । ध्यानाकर्षित हो कि मात्र लोकलुभावन योजनाओं की घोषणा ही पर्याप्त नही है अपितु उन्हें कार्य रूप में परिणित करना भी आवश्यक है अन्यथा इसके अभाव में पीड़ित परिवारों के ” घाव पुनः हरे ” हो जावेंगे तथा उनमें शासन-प्रशासन के प्रतिअविश्वास का भाव उतपन्न होगा,जिसके दूरगामी परिणाम शासन के हित में तो कदापि नहीं होंगे ।

नरेश शर्मा , राज्य पुलिस सेवा , नगर पुलिस अधीक्षक ( सेवा निवृत ) जबलपुर

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