क्या जाँबाज़ थे वे बलिदानी , क्या धन्य थी उनकी जवानी : नरेश शर्मा

स्वतन्त्रता संग्राम पर बनी फिल्मों में मनोज कुमार द्वारा निर्मित , निर्देशित व अभिनित फ़िल्म “शहीद” ( शहीदे आज़म भगतसिंह , राजगुरु , सुखदेव की वीरगाथा से परिपूरित ) के उपरान्त “सरदार उधम” ने अत्यन्त रोमांचित व अश्रुपूरित गर्वान्वित किया है । यह आम वॉलीवुड फिल्मों से भिन्न 1930-40 को पंजाब व लंदन को जीवन्त करता चलचित्र है । सुजीत सरकार ने “देशभक्ति” की इस अमर गाथा को अति सहजता व छद्मता से परे प्रदर्शित किया है । बलिदानी , क्रांतिकारी , शहीद उधमसिंह जी के व्यक्तित्व , जलियाँवाला नरसंहार की क्रूरता का उन पर प्रभाव , पंजाब के तत्कालीन गवर्नर माइकल ओ’ड्वायर की हत्या हेतु 21 वर्ष की उनकी योजनाबद्ध धैर्यपूर्ण तैयारी , इस हेतु रावलपिंडी , अफगानिस्तान , रूस , जर्मन ,अमेरिका व लंदन की यात्राओं व अपने उद्देश्य की पूर्ति की उनकी दृढ़ निश्चयता की इस वीरगाथा से पूर्ण रूपेण कम ही लोग अवगत होंगे । मैं भी व्यक्तिगत रूप से अनेक तथ्यों से अनभिज्ञ था । जनरल डायर की कायरतापूर्ण क्रूरता हतप्रभ करने योग्य है । जालियाँवाला बाग का ह्रदयविदारक दृश्य भाव विव्हल कर देता है । इस धटना का प्रभाव 102 वर्ष व्यतीत होने के उपरांत ( 13 अप्रेल 1919 ) आज भी अमृतसर व पंजाब में प्रत्यक्ष है । उन सभी वीर शहीदों को जिन्होंने जालियाँ वाला बाग में ” रोलेट एक्ट ” न दलील,न अपील,न वकील जैसे काले कानून का विरोध करते अंग्रेजों की चूलें हिला दी थी व अपने जीवन की आहुति दे दी उन्हें अश्रुपूरित शत शत नमन , श्रद्धान्जली 🙏🙏आज़ादी के दीवाने उधमसिंह ने बर्बर ब्रिटिश प्रताड़नाओं के आगे बिना टूटे , माफीनामे के विकल्प को ठुकराते हुये फाँसी के फन्दे को चूम लिया । इस नवजवान ने अपना नाम धर्मनिरपेक्षता के अनुरूप ” राम मोहम्मद सिंह आज़ाद ” रख लिया था व अपनी कलाई पर गुदवा भी लिया था । फ़िल्म में भगतसिंह पर कुछ क्षणों का चित्रण भी किया है जो निश्चित रूप से प्रत्येक भारतीय को गर्व का अनुभव कराता है । इन दोनों क्रांतिवीरों की परंपरा राजनैतिक आज़ादी के अतिरिक्त मानवीय स्वतंत्रता की भी थी । फ़िल्म में कुछ दृश्य तो अद्वितीय व कमाल के बेजोड़ है — भगतसिंह का अपने साथियों से क्रांति व क्रांतिकारी को परिभाषित करना , उधमसिंह द्वारा अंग्रेज अधिकारी को पूछताछ के दौरान द्विभाषिये के माध्यम से पूछना कि ” तुम 23 वर्ष की उम्र में क्या कर रहे थे ? ” प्रत्युत्तर में अंग्रेज अधिकारी खुशी से कहता है कि ” शादी की थी , एक बच्चा भी था , अफसर बन गया था , बढ़िया जीवन जी रहा था ।” तब उधमसिंह कहते हैं कि तुम भगतसिंह पर बात करने लायक ही नही हो । स्मरण है कि शहीदे आज़म भगतसिंह मात्र 23 वर्ष की आयु में अपने देश प्रेम में वीरगति को प्राप्त हो गये थे । यह फ़िल्म न केवल स्वतन्त्रता संग्राम की कहानी है अपितु एक वीर दृढ़ निश्चयी व्यक्ति के निजी द्वंद्व की भी कथा है । एक संवाद इस प्रकार का भी है कि हिंदुस्तानी अपने शत्रुओं को 20 साल बाद भी नही भूलते हैं , प्रतिशोध ले ही लेते हैं । एक अन्य स्थान पर उधमसिंह की परजाई ( भाभी ) उनसे पूछती है कि ब्याह करेगा या सारयाँने ( सभी ने ) फंदा ही चूमना है । सत्य भी है कि आज़ादी के अनेकोनेक परवानों ने हँसते-हँसते फाँसी के फन्दों को चूमकर अपना सर्वोत्कृष्ट बलिदान देकर हमारे लिए स्वतन्त्रता उपलब्ध कराई । हमारे लिये उनकी इस कृपा से कभी भी उऋण होने की कल्पना करना भी पाप है । शत शत नमन ।

नरेश शर्मा,राज्य पुलिस सेवा , नगर पुलिस अधीक्षक ( से.नि. ) , जबलपुर म.प्र.

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