जनतांत्रिक व्यवस्था में चौथे खंभे के रूप में पत्रकारिता

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प्रजातंत्र में पत्रकारिता का विशेष महत्व होता है। समय और समाज के संदर्भ में सजग रहकर नागरिकों में दायित्व बोध कराने की कला को पत्रकारिता करते हैं। आज पत्रकारिता जनसेवा का सशक्त माध्यम है। पत्रकारिता हमें हमारे समाज, देश की समस्याओं तथा विचारों से रूबरू नहीं कराती बल्कि संपूर्ण विश्व भर की घटनाओं को हमारे सामने प्रस्तुत करती हैं। आज पत्रकारिता एक ऐसी शक्ति बन गई है, जो समाज की कमियों, गलतियों तथा कुरीतियों को उजागर करके उन्हें दूर करने का प्रयास करती है।

प्रजातांत्रिक व्यवस्था के तीन स्तंभ व्यवस्थापिका, कार्यपालिका, और न्यायपालिका है। इनमें से कौन पहला तथा कौन ज्यादा महत्वपूर्ण है? यह चर्चा का विषय है। परंतु निर्विवादित रूप से चौथा स्तम्भ पत्रकारिता ही हैं। पत्रकारिता का जन्म और शासक और शासित के मध्य एक समझदारी, समन्वय तथा तारतम्यता बनाए रखने के उद्देश्य से हुआ। चूंकि लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में सामान्य लोग अपने मतदान के अधिकार का प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से प्रयोग कर अपने शासकों का चुनाव करते हैं।यह आवश्यक हो जाता है कि शासक यह समझे कि शासित क्या चाहता है और शासित भी जाने कि उनके शासक उनके और देश के लिए कैसे काम कर रहे हैं! अतः पत्रकारिता ही वह माध्यम है जो जनता की भावनाओं के भावनाओं के अनुकूल नीति निर्धारण करने का दबाव बनाता है। इसी प्रकार शासक देश की अर्थव्यवस्था, सुरक्षा, शिक्षा, विदेश नीति को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं। इसकी संपूर्ण जानकारी पत्रकारिता के माध्यम से जनमानस को हो पाती है।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में पत्रकारिता का सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्य लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना और उनकी रक्षा करना है। एक ओर पत्रकारिता शासकों के निजी एवं सार्वजनिक आचरण पर नियंत्रण रखता है और उन्हें साफ-सुथरी शासन की प्रक्रिया को स्थापित करने के लिए बाध्य करता है। लोकसभा, राज्यसभा, राज्य विधानमंडलों में होने वाली नीतिगत गंभीर बहस तथा अन्य अनेक ज्वलंत मुद्दों पर होने वाली चर्चा से पत्रकारिता लोगों को परिचित कराता है और लोगों को उनके जनतांत्रिक अधिकारों और कर्तव्यों से भी अवगत कराता है। वही पत्रकारिता अपने कर्तव्य द्वारा कार्यपालिका को निरंकुश तथा भ्रष्ट होने से रोकता है, और अन्य जरूरी सूचनाओं को जन-जन तक‌ पहुंचाता है। न्यायपालिका के महत्वपूर्ण एवं ऐतिहासिक फैसलों की जानकारी भी सरल एवं स्पष्ट रूप में उपलब्ध कराता है। इन सब कर्तव्य का निर्वाह करने के लिए पत्रकारिता का स्वतंत्र एवं निष्पक्ष होना अत्यंत आवश्यक है नहीं तो वह खुलकर सरकार की आलोचना नहीं कर पाएगी तथा हाशिए पर खड़े विषयों, लोगों को केंद्र में नहीं ला पाएगी।

जनमत निर्माण की दिशा में भी पत्रकारिता की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी नीति को देश या विदेश के नागरिकों पर बलपूर्वक थोपा नहीं जा सकता है। किसी भी नीति को लागू करने के लिए जनमत की आवश्यकता होती है या काम वृहद स्तर पर पत्रकारिता (प्रेस) करता है।
प्रेस संबंधी प्रमुख कानून

प्रेस के कानून पत्रकारों के लिए कुछ विशेषाधिकारों का प्रावधान करते है और उन्हें कुछ कर्तव्यों के लिए बाध्य भी करते है। समाज के सुचारू रूप से संचालन के लिए सरकार को अनेक कानून बनाने पड़ते है। भारत के संविधान में सभी नागरिकों को प्रेस की आजादी का गारंटी दी गई है। परन्तु देश की सुरक्षा और एकता के हित में और विदेशों से सम्बन्धों तथा कानून और व्यवस्था, शालीनता और नैतिकता या अदालत अवमानना, मानहानि या अपराध को प्रोत्साहन के मामलों में इस अधिकार पर राज्य द्वारा अंकुश लगाया जा सकता है। जो कानून प्रेस पर लागू होते है, वे इस प्रकार है-

मानहानि

भारतीय दण्ड संहिता (1860) की धारा 399 के अनुसार राष्ट्र के प्रत्येक नागरिक के अपना ईमानदारी, यश, प्रसिद्धि,प्रतिष्ठा, मान-सम्मान आदि के सुरक्षित रखने का पूरा अधिकार प्राप्त है। इस कानून के अनुसार जो कोई या तो बोले गए या पढ़े जाने के आशय से शब्दों या संकेतो द्वारा किसी व्यक्ति के बारे में इस इरादे से लांछन लगता है तथा ऐसे लांछन से व्यक्ति की ख्याति की हानि होगी तो वह मानहानि का दावा कर सकता है। दावा साबित होने पर दोषी को 2 वर्ष की साधारण कैद या जुर्माना या दोनों सजा दी जा सकती है।

इसलिए पत्रकारों को इस मामले में सचेत रहना जरूरी है। अप्रमाणित कथा, सुनी सुनाई बातों के आधार पर किसी पर आरोप नहीं लगाया जाना चाहिए। कुछ ऐसी परिस्थितियाँ हैं, जिनमें पत्रकार मानहानि के दो‌षों से बच सकता है। सार्वजनिक हित में किसी संस्था या व्यक्ति के आचरण पर टिप्पणी की जा सकती है। जब इसमें निजी स्वार्थ या बदला लेने की भावना ना हो।

संसद तथा विधान मंडलों के सदस्यों के विशेषाधिकार

विश्व के प्रायः सभी देशों के संसद तथा विधान मंडलों के सदस्यों को कुछ विशेष अधिकार प्राप्त है। भारत में यह विशेषाधिकार हमारी शासन व्यवस्था में सन् 1833 से किसी न किसी रूप में विद्यमान है। इस विशेषाधिकार के अनुसार यदि संसद की कार्यवाही को तोड़-मरोड़ कर उस पर अनुचित या निंदाजनक टिप्पणी करके संसद की कार्यवाही से निकाली गई बातों को प्रकाशित करने पर विशेषाधिकार हनन का मामला बनता है।

न्यायालय की अवमानना

सन् 1971 में न्यायालय की अवमानना का नया कानून पारित किया गया। यह कानून अत्यंत व्यापक है तथा थोड़ी भी असावधानी संपादकों और पत्रकारों को मुसीबत में डाल सकती है। न्याय प्रणाली की पवित्रता और विश्वसनीयता को बनाए रखने के लिए यह कानून बनाया गया है।
अवमानना की परिस्थितियाँ निम्नलिखित है-

अगर न्यायालय के न्यायाधीश पर अनौचित्य और अयोग्यता का आरोप लगाया जाए अथवा उनके चरित्र के हनन का प्रयास किया जाए तो यह न्यायालय की अवमानना है।न्यायपालिका की प्रतिष्ठा, गरिमा, अधिकार अथवा निष्पक्षता पर संदेह प्रकट करना।विचाराधीन मामलों में संबंधित जज, पक्षकारों तथा साक्षियों को प्रभावित‌ करने का प्रयास करना अथवा उन पर किसी प्रकार के आक्षेप लगाना।अदालत की कार्यवाही की रिपोर्ट चोरी-छिपे प्रकाशित करना।
प्रेस परिषद अधिनियम

भारत में समाचार पत्रों तथा समाचार समितियों के स्तर में सुधार एवं विकास तथा प्रेस की स्वतंत्रता को बनाए रखने की आवश्यकता महसूस करते हुए भारतीय संसद ने सन् 1978 में प्रेस परिषद अधिनियम पारित किया। इसके उद्देश्य इस प्रकार हैं-

समाचार पत्र तथा समाचार समितियों की स्वतंत्रता को कायम रखना।महत्वपूर्ण तथा जनरुचि के समाचारों के प्रेषण पर, संभावित अवरोधों पर दृष्टि रखना।
उच्च स्तर के अनुरूप पत्रकारों के लिए आचार संहिता तैयार करना।
भारतीय समाचार पत्र तथा समाचार समितियों को मिलने वाली विदेशी सहायता का मूल्यांकन करना।
पत्रकारिता से संबंधित व्यक्तियों में उत्तरदायित्व की भावना तथा जनसेवा की भावना को विकसित करना।
मुद्रण रेखा(Print Line)

संपादक और मुद्रक के दायित्वों को कानून की दृष्टि से वैध बनाने के लिए समाचार पत्र के किसी पृष्ठ पर (विशेषकर अंतिम पृष्ठ के किसी किनारे पर) संपादक, मुद्रक, प्रकाशक, प्रेस एवं कार्यालय का नाम कथा पते का विवरण देने की परिपाटी है। इस विवरण को ही मुद्रण रेखा के नाम से जाना जाता है।

इसके अलावा भी कई प्रेस संबंधित कानून है। जिन्हें ध्यान में रखकर पत्रकारिता करनी पड़ती है।प्रेस परिषद् अधिनियम, 1978 की धारा 13.2(ख) द्वारा परिषद् को समाचार कर्मियों की सहायता तथा मार्गदर्शन हेतु उच्च व्ययवसायिक स्तरों के अनुरूप समाचार-पत्रों, समाचार एजेंसियों और पत्रकारों के लिये आचार संहिता बनाने का निर्देश दिया गया है।
पत्रकारों के लिए अपनाई गई आचार संहिता इस प्रकार है –

पत्रकारिता जनमत के निर्माण के लिए एक प्राथमिक उपकरण है,इसलिए पत्रकारों का यह कर्तव्य है कि वह इसे एक ट्रस्ट या दायित्व समझे और जनहित की सेवा तथा रक्षा के लिए हमेशा तैयार और इच्छुक रहें।
अपने कर्तव्य का पालन करते समय पत्रकार मानव के मूलभूत और सामाजिक अधिकारों को उचित महत्व देंगे और समाचारों की रिपोर्ट देते समय उन पर टिप्पणी करते समय सद्भाव और न्यायप्रियता का ध्यान रखेंगे।
समाचारों और तथ्यों को ईमानदारी से संग्रह करने और प्रकाशन करने की स्वाधीनता तथा उचित टिप्पणी और आलोचना करने का अधिकार ऐसी सिद्धांत है, जिन्हें प्रत्येक पत्रकार को हमेशा सुरक्षित रखना चाहिए।
सभी सूचना और प्रकाशित टिप्पणियों के लिए दायित्व स्वीकार किया जाएगा। यदि दायित्व स्वीकार नहीं किया जा रहा है, तो पहले से ही स्पष्ट रूप से प्रकट कर दिया जाएगा।
पत्रकार उन समाचारों और टिप्पणियों पर नियंत्रण रखेंगे, जिनसे तनाव बढ़ता है और हिंसा को प्रोत्साहन मिल सकता है।
पत्रकार अपने पेशेवर आचरण को निजी हितों से प्रभावित नहीं होने देंगे।
समाचार-पत्रों में निजी विवादों को जारी रखना, जब कोई सार्वजनिक प्रश्न-मुद्दा न हो, पत्रकारिता की परंपरा के विरुद्ध है।प्रसार भारती देश में सार्वजनिक प्रसारण सेवा है। आकाशवाणी और दूरदर्शन इसके दो घटक है। लोगों को सूचना, शिक्षा तथा मनोरंजन प्रदान करने और रेडियो पर प्रसारण का संतुलित विकास सुनिश्चित करने के लिए 23 नवम्बर 1997 को प्रसार भारती का गठन किया गया।प्रसार भारती बिल 1989 ई. में संसद में पेश किया गया। इसे प्रस्तुत करते हुए तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री ने कहा कि इसके माध्यम से इलेक्ट्रानिक मीडिया सरकारी नियंत्रण से मुक्त हो जाएगा तथा सही अर्थों में यह भारत के लोगो का प्रतिनिधित्व स्वर बनेगी।1989 में लाया गया प्रसार भारती बिल मुख्यतः 1978 के वर्गीज कमिटी पर ही आधारित था। वर्गीज कमिटी की रिर्पोट में जोर इस बात पर था कि एक ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिससे भविष्य में संचार माध्यमों का दुरूपयोग न हो सके तथा प्रसारण की स्वायत्ता के लिए वैधानिक प्रावधान की बात करता है। प्रसार भारती बिल 1990 में पारित किया गया लेकिन इसे लागू करने से पूर्व ही सरकार गिर गई। जिसके कारण एक लम्बें अन्तराल के बाद 1997 में प्रसार भारती कानून लागू हुआ।
प्रसार भारती अधिनियम 1990 में वर्णित प्रसार भारती निगम के प्रमुख लक्ष्य इस प्रकार है—

देश की एकता एवं अखण्डता को बढ़ावा देना।
संविधान में वर्णित मूल्यों को बनाए रखना।
जनहित के सभी मामलों के बारे में जानकारी प्रदान करना।
शिक्षा एवं सारक्षता का प्रचार-प्रसार करना।
समाज के जरुरतमन्द लोगों के हितों के बारे में जागरूकता पैदा करना।तकनीकी विकास को साथ-साथ जनसंचार माध्यमों यथा हिन्दी पत्रकारिता के रूख में तेजी से परिवर्तन देखने को मिला है। तकनीकी के विस्तार से हिन्दी पत्रकारिता के विस्तार में मदद मिली है। हिन्दी समाचार चैनल, समाचार पत्रों के साथ-साथ हिन्दी में समाचार वेबसाइट के कारण हिन्दी पत्रकारिता का दायरा बढ़ा है। हिन्दी पत्रकारिता को व्यवसायिक कलेवर में ढाला जा चुका है। वहीं तमाम समानान्तर माध्यम भी कार्य कर रहे है, जो व्यवसायिकता से अभी परे है। यह समय के साथ लगातार विकसीत हो रहा है। तकनीकी के कारण सूचनाओं पर लगने वाली बंदिशे कम हुई है और लोगो तक अबाध सूचना का मार्ग प्रशस्त हुआ है। इन सबके चलते हिन्दी पत्रकारिता ने नये दौर मे प्रवेश किया है।

21वीं शताब्दी सूचना प्रौद्योगिकी का युग है। आधुनिक संचार तकनीकी का मूल आधार इन्टरनेट है। कलमविहीन पत्रकारिता के इस युग में इन्टरनेट पत्रकारिता ने एक नए युग का सूत्रपात किया है। वेब पत्रकारिता को हम इन्टरनेट पत्रकारिता, ऑनलाइन पत्रकारिता, साइबर पत्रकारिता के नाम के जानते है।
यह कम्प्यूटर और इंटरनेट द्वारा संचालित एक ऐसी पत्रकारिता है, जिसकी पहुँच किसी एक पाठक, एक गाँव, एक प्रखण्ड, एक प्रदेश, एक देश तक नहीं अपितु समूचे विश्व तक है।

प्रिंट मीडिया से यह रूप में भी भिन्न है इसके पाठकों की संख्या को परिसीमित नहीं किया जा सकता है। इसकी उपलब्धता भी सर्वाधिक है। इसके लिए मात्र इन्टरनेट और कम्प्यूटर, लैपटॉप या मोबाइल की जरूरत होती है। इंटरनेट वेब मीडिया की सर्वव्यापकता को भी चरितार्थ करती है जिसमें खबरें दिन के चौबीसों घण्टे और हफ्ते के सातों दिन उपलब्ध रहती हैं वेब पत्रकारिता की सबसे बड़ी खासियत है उसका वेब यानी तरंगों पर आधारित होना । इसमें उपलब्ध किसी दैनिक, साप्ताहिक, मासिक पत्र-पत्रिका को सुरक्षित रखने के लिए किसी आलमीरा या लाइब्रेरी की ज़रूरत नहीं होती।

समाचार पत्रों और टेलीविजन की तुलना में इंटरनेट पत्रकारिता की उम्र बहुत कम है लेकिन उसका विस्तार बहुत तेजी से हुआ है। उल्लेखनीय है कि भारत में इंटरनेट की सुविधा 1990 के मध्य में मिलने लगी। इस विधा में कुछ समय पहले तक अंग्रेजी का एकाधिकार था लेकिन विगत दशकों में हिन्दी ने भी अपनी प्रभावी उपस्थिति दर्ज की है। इंदौर से प्रकाशित समाचार पत्र ‘नई दुनिया’ ने हिन्दी का पहला वेब पोर्टल ‘वेब दुनिया’ के नाम से शुरू किया। अब तो लगभग सभी समाचार पत्रों का इंटरनेट संस्करण उपलब्ध है। चेन्नई का ‘द हिन्दू’ पहला ऐसा भारतीय अखबार है जिसने अपना इंटरनेट संस्करण वर्ष 1995 ई. में शुरू किया। इसके तीन साल के भीतर यानी वर्ष 1998 ई. तक लगभग 48 समाचार पत्र ऑन-लाइन हो चुके थे। ये समाचार पत्र केवल अंग्रेजी में ही नहीं अपितु हिन्दी सहित अन्य भारतीय भाषाओं जैसे मलयालम, तमिल, मराठी, गुजराती आदि में थे। आकाशवाणी ने 02 मई 1996 ‘ऑन-लाइन सूचना सेवा’ का अपना प्रायोगिक संस्करण इंटरनेट पर उतारा था। एक रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2006 ई. के अन्त तक देश के लगभग सभी प्रतिष्ठित समाचार पत्रों एवं टेलीविजन चैनलों के पास अपना इंटरनेट संस्करण भी है जिसके माध्यम से वे पाठकों को ऑन-लाइन समाचार उपलब्ध करा रहे हैं।

ऑन-लाइन पत्रकारिता, हिन्दी ब्लॉग, हिन्दी ई-पत्र-पत्रिकाएँ, हिन्दी ई-पोर्टल, हिन्दी वेबसाइट्स, हिन्दी विकिपीडिया आदि के रूप में नव-जनमाध्यम आधारित हिन्दी पत्रकारिता के विविध स्वरूपों को समझा जा सकता है।

समाचार लेखन

समाचार लेखन एक विशिष्ट कला है। श्रेष्ठ समाचार वही है, जो सूचनात्मक हो और उसमें तथ्यों को इस प्रकार संकलित किया गया हो कि पाठक घटित घटना का विवरण सही परिप्रेक्ष्य में समझ सके। समाचार लेखन में निम्नलिखित प्रक्रियाएँ पूरी की जाती है –

समग्र तथ्यों को संकलित करना।कथा (News Story) की काया की योजना वनाना एंव लिखना।आमुख लिखना।परिच्छेदों का निर्धारण करना.वक्ता के कथन को अविकल रूप नें प्रस्तुत करना।सूत्रों के संकेत को उद्धृत करना।

समाचार लेखन की प्रक्रिया तीन चरणों में पूर्ण होती है– आमुख (Introduction),समाचार की शेष रचना (Body of the Story), शीर्षक (Headline).

आमुख(Intro)

अंग्रेजी के Introduction का लघु रूप Intro है। जिसे अमेरिका पत्रकारिता में लीड कहा जाता है। उल्टा पिरामिड शैली में समाचार लेखन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू आमुख लेखन या इंट्रो या लीड लेखन है। आमुख समाचार का पहला पैराग्राफ होता है, जहां से कोई समाचार शुरु होता है। आमुख के आधार पर ही समाचार की गुणवत्ता का निर्धारण होता है। एक आदर्श आमुख में किसी समाचार की सबसे महत्वपूर्ण सूचना आ जानी चाहिये और उसे किसी भी हालत में 35 से 50 शब्दों से अधिक नहीं होना चाहिये। समाचार का पहला अनुच्छेद जिसमें संवाद का सार-सर्वस्व निहित हो, आमुख होता है। क्या, कहाँ, कब, किसने, क्यो, और कैसे की तुलना सीधे-सपाट और छोटे वाक्यों में पाने के लिए आमुख दिया जाता है। यह पूरे समाचार का प्रदर्शन प्रारूप है। कहा जाता है कि Well begun is half done – शुरूआत ठीक हो गई तो समझो आधा काम हो गया। यह बात समाचार के इंट्रो पर शब्दशः लागू होती है। एक आदर्श इंट्रो लिखना आसान काम नहीं है, किन्तु अच्छा इंट्रो लिखने की योग्यता को अभ्यास तथा सजगता के गुणों से हासिल किया जा सकता है। एक अच्छे इंट्रो में निम्नलिखित विशेषताएँ होनी चाहिए जैसे- संक्षिप्तता, अनुरूपता, सहजता, रोचकता और दार्शनिकता।

समाचार की शेष रचना(Body of the story)

इंट्रो के बाद समाचार की शेष रचना लिखी जाती है। इसे प्रायः (Body of the story) कहा जाता है। यह हिस्सा क्रमबद्ध ढंग से घटना तथ्यों को संजोये हुए रहता है। एक आकर्षक तथा रूचिपूर्ण इंट्रो पाठक को पूरा समाचार पढ़ने के लिए प्रेरित करता है, इसलिए समाचार लेखन द्वितीय चरण भी उतने सजगतापूर्वक लिखा जाना चाहिए। समाचार लेखन‌ के इस द्वितीय चरण में आमुख में उल्लेखित तथ्यों की व्याख्या और विश्लेषण होता है।

समाचार तथा पत्र-पत्रिकाओं को कम से कम जगह में अधिक से अधिक साम्रगी का समायोजन करना होता है। इसलिए सार्थक, संक्षिप्त और समाचार लिखना सर्वोत्तम है, जिन्हें साधारण जन भी रूचिपूर्वक कम समय देकर पढ़ सके। किसी घटना के विषय में (क्या, कब, कहाँ, कैसे, क्यों और कौन) जैसे मूल प्रश्नों का उत्तर विस्तारपूर्वक मिलना चाहिए।समाचार का समापन करते समय यह ध्यान रखना चाहिये कि न सिर्फ उस समाचार के प्रमुख तथ्य आ गये हैं बल्कि समाचार के आमुख और समापन के बीच एक तारतम्यता भी होनी चाहिए। समाचार में उल्लेखित तथ्यों और उसके विभिन्न पहलुओं को इस तरह से पेश करना चाहिए कि उससे पाठक को किसी निर्णय या निष्कर्ष पर पहुंँचने में मदद मिले।

शीर्षक(Headline)

शीर्षक समाचार-सार, घटना-परिणाम तथा स्थिति संकेत का सूचक होता है। शीर्षक बनाना एक कला है जिसके द्वारा पाठकों के मन और मस्तिष्क पर सत्ता स्थापित की जाती है।

समाचार के शीर्षक लिखने वालों को निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना पड़ता है-

शीर्षक में समाचार का मूल-भाव निहित हो।शीर्षक भूतकाल में ना लिखा जाए।अकर्मक क्रिया का यथासंभव कम प्रयोग हो।शीर्षक के द्वारा ही पृष्ठ-सज्जा को प्रभावपूर्ण बनाना।

शीर्षक लेखन के बाद यह बताया जाता है कि खबर किस से प्राप्त हुई है। वह खबर अखबार के अपने संवाददाता ने भेजी है या फिर किस एजेंसी से प्राप्त हुई है। इसका उल्लेख शीर्षक के ठीक नीचे इस प्रकार करते हैं- जनसत्ता संवादाता द्वारा, विशेष संवाददाता द्वारा, कार्यालय संवाददाता द्वारा आदि। समाचार लिखते समय सबसे पहले बाई ओर सर्वप्रथम समाचार से जुड़े स्थान तथा तिथि का उल्लेख करते हैं।
संवाददाता की योग्यता और दायित्व
समाचारों का शीघ्र संकलन,उनकी सुस्पष्ट व्याख्या तथा शुद्धता के साथ पाठकों के लिए उसे बोधगम्य बनाने का कार्य संवादाता करता है। वह गुप्तचर,मनोवैज्ञानिक एवं वकील के गुणों से संपन्न होकर अपनी प्रतिभा के बल पर समाज सेवा करता है। यह कार्य बड़ा कठिन है।व्यवहारिक ज्ञान और भाषा पर अधिकार यह संवादाता के मूल गुण होते हैं साथ ही उसमें श्रेष्ठ मानवीय मूल्यों का भी समावेश होना आवश्यक है। किसी भी संवादाता को पर्याप्त सहनशील, परिश्रमी, दूरदर्शी होने के साथ-साथ वाकपटुता में भी निपुण होना आवश्यक है।

  • संवाददाता बनने के लिए निम्न योग्यताएं होना का आवश्यक है-

संवाददाता के अंदर समाचार का बोध होना आवश्यक है। जैसे- किसी घटना को एक अच्छे समाचार का रूप कैसे दें तथा आस-पास घटित होने वाली अनेक घटनाओं के इस ढ़ेर में से पाठक या श्रोता के महत्व और रूचि के अनुसार समाचारों का वर्गीकरण कर उन्हें किस प्रकार संप्रेषित किया जाए।पैनी दृष्टि तथा विस्तृत श्रवण शक्ति।मुद्र लेखन, आशु लेखन एवं टंकण का ज्ञान।सत्यनिष्ठा और निर्भीकता।जटिल घटनाओं, विविध समस्याओं को समझने की शक्ति।समाचार की गहराई में जाने के लिए, नए-नए तथ्यों तथा सत्य को उद्घाटित करने के लिए जिज्ञासु-वृति का होना आवश्यक है।संवाददाता में कल्पना शक्ति साथ ही गतिशीलता, यथार्थता, वस्तुनिष्ठता भी होना महत्वपूर्ण है।
संपादन कला,संपादक का उत्तरदायित्व,शीर्षकीकरण, आमुख
सम्पादन का शाब्दिक अर्थ है – किसी काम को अच्छी और ठीक तरह से पूरा करना। किसी पुस्तक का विषय या सामयिक पत्र के लेख आदि अच्छी तरह देखकर उनकी त्रुटियाँ आदि दुर करके और उनका ठीक क्रम लगा कर उन्हें प्रकाशन के योग्य बनाना।

वास्तव में सम्पादन एक कला है। इसमें समाचारों, लेखों, या कहें कि किसी समाचार पत्र-पत्रिका में प्रकाशित की जाने वाली सभी तरह की सामग्री का चयन किया जाता है। सम्पादन आसान काम नहीं है। इसमें मेधा, निपुणता और अभिप्रेरणा की आवश्यकता होती है। जे. एडवर्ड मर्रे ने ठीक ही कहा है – “Because copy editing is an art, the most important ingredient after training and talent is strong motivation. Not only he should know his job but also he must love it………”

संचार माध्यमों के संदर्भ में जब हम सम्पादन की चर्चा करते हैं तब सम्पादन का अर्थ समाचार के पाठक, दर्शन तथा श्रोता के लिए ग्रहणीय बनाना होता है। अतः समाचार का उद्देश्य – “समाचार को पाठक, दर्शक तथा श्रोता के लिए उपयोगी बनाना।”

संकलकर्ता : अखिलेश चंद्रोल

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